बनारस 03
गली बनारस :
बनारस गलियों का शहर है I गंगा के किनारे- किनारे आबादी बसती गयी, गलियाँ बनती गयीं I गंगा शहर की जीवन-रेखा है और गलियाँ उस तक पहुँचानें वाली डोर I इन गलियों में जीवन का राग-विराग मिलता है I इन बंद गलियों में मंद-मंद मुस्कान के साथ विचरते हुए तुषारापात तब होता होता है जब नंदी का कोई अवतार दुर्वासा-मनोदशा में आपसे टकराता हैI नंदी-मिलाप का एक रोचक वर्णन कशीनाथ जी ने अपने अस्सी भाष्य में रख छोड़ा है I
एक दुर्दान्त अनुभव हमें ऋषिकेश में हो चुका है I जुलाई का महीना था ,मूसलाधार बारिश हो रही थी I अचानक एक नंदी अवतार ने हम पर कृपा दृष्टि डाली I हम सात थे और सातो बेतहाशा दौड़ रहे थे I याद नहीं कि उससे पहले ऐसी सरपट दौड़ हमने कब लगाई थी I लगभग एक किलोमीटर रेस लगाने के बाद अचानक नंदी ने आगे की दौड़ का विचार त्याग दिया और उपेक्षा से हुंकारता हुआ दूसरी दिशा में मुड़ गया I
जान बची तो लाखों पाए वाले अंदाज़ में हम साँसों के आरोह–अवरोह को सम पर लाते हुए अनसुलझी रह गयी गुत्थी सुलझा रहे थे कि आखिर भूसे की खुशबू आ किधर से रही I खैर! लौटते हैं बनारस पर I सूरज चाचू बनारस की इन गलियों में कम ही झांकते हैं I इस मामले में इन्हें असूर्यस्पर्शा कह सकते हैं I लखनऊवा भूलभुलैया सरीखी इन गलियों में गुम हो जाने,भटक जाने का खतरा तो रहता ही है ऊपरी किसी मंजिल से पान की पीक के रूप में आशीर्वाद बरसने की संभावना लगातार बनी रहती है I
गलियां बेहद संकरी हैं I संकरेपन से अधिक इनमें फैली गन्दगी पैदल परिक्रमा को दुरूह बनाती है Iसाथ ही गलती से कोई गुस्सैल साँड़ टकरा जाए तो जान हथेली पर आ जाती है I रास्ता ढूँढ़ते हुए बाज दफ़ा सिरे पर बंद गली आपके मुंह पर तमाचे सी पड़ती है I फिर भी रहन-सहन , आचार-विचार-व्यवहार के सिरे को पकड़ने के लिए इनकी परिक्रमा जरूरी है I
अगर ये गलियाँ साफ़-सुथरी होतीं तो एक खूबसूरत मेज़ (maze) बनातीं I कभी किसी जमाने में इनमें जीवन की मिठास घुलती थी अथवा नहीं कहना मुश्किल है किन्तु ये जीवन में उल्लास जरूर भरती रही होंगी I आज की तारीख में ये भले ही आब्सोलीट लगती हों पुरानी बसावट के सिलसिले में इनका अपना सामाजिक-सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है I
इन बंद गलियों से जुड़े कुछ अजब से किस्से भी पढ़ने को मिले I एक किस्सा अजय मिश्र जी ने दर्ज़ किया हैI काशी में रईसों में एक घराना है , इसे झक्कड़ घराने के नाम से जाना जाता है I सुनते हैं कि इस घराने के एक रईस दुमंजिले पर खिड़की में पान घुला कर बैठे रहते थे और जैसे ही नीचे गली से कोई अपने कपड़ों में सफ़ेदी की चमकार लिए गुजरता ये ऊपर से पीक की पिचकारी चला देते I खार खाया राहगीर अपनी हैसियत के हिसाब में बिगड़ता , गाली-गलौज करता तो रईस आह्लादित होते और बन्दे को दबंग का तमगा दे देते I जो कहीं भुक्तभोगी कसमसा कर बिना प्रतिवाद आगे बढ़ जाता तो वो मानते की उनके रुआब में आ गया I
किस्सा-कोताह एक तरफ़ यकीनन गलियों में छितरी गन्दगी से बीमारियाँ फैलती होंगी I नगर निगम सफाई के अपने उत्तरदाइत्व के प्रति पूरी तरह से लापरवाह दिखता है और जनता लाचार-बेज़ार नज़र आती है I गलियों के शहर बनारस को एक पुरसाहाल की दरकार है I
_______________नीलिमा
तस्वीर-नितिन
© neelima

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