बनारस:01
शहर के दो नाम हैं : काशी और वाराणसी। लेकिन यह पहचाना बनारस के नाम से जाता है। वाराणसी पीछे छूट गया बनारस लोकप्रिय हो गया। लोकप्रियता से इतर बनारस नाम का अपना ऐतिहासिक महत्व है। इतिहास लिखने-पढ़ने,जानने-समझने वाला इस बात से वाकिफ़ है कि अरसा पहले वाराणसी बनारस में तब्दील हो गया था। बौद्ध जातकों से इस बात की तस्दीक की जा सकती है। बौद्ध जातकों से गुजरते हुए आप पाते हैं की ढेरों जातक ऐसे हैं जो अपना शुरुआती अलाप बनारस के नाम से लेते हैं... 'एक समय की बात है जब बनारस में वृहदत्त नामक राजा शासन करता था...'
जातकों का यह अलाप तमाम तरह की ऐतिहासिक उत्सुकताएँ तो जगाता ही है साथ ही बनारस नाम की प्राचीनता का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज भी मुहैया करवाता है। इतिहास की यह कड़ी बनारस में हमारी रुचि और लगाव के मूल में है। और भी तमाम उत्सुकताएँ हैं। उनमें सबसे प्रबल सारनाथ को लेकर है। क्या वजह रही होगी कि बुद्ध बोधगया से सारनाथ की लंबी चौड़ी दूरी पैदल तय करने के बाद सारनाथ में अपना पहला उपदेश देते हैं? बी.ए. के छात्र के रूप में हम इस बात पर अक्सर हैरान होते थे। ऐसी ही कुछ बचकानी हैरानियों ने बनारस शहर को इतिहास के आईने में देखने की ख्वाहिश बुलंद की। देखते हैं कितनी उलझनें इतिहास के तथ्यों को सुलझाती हैं...
___________________नीलिमा
पेंटिंग: एडवर्ड लार्ड वीक्स(1883)
स्रोत:आर्काइव्ज
©neelima

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