धर्म,महामारी और चित्रकला :04

मध्य युग के यूरोप में, जहाँ एक ओर भवन निर्माण कला के उत्कृष्ट उदाहरण हमें गिरजों और राजमहलों में देखने को मिलते हैं वहीं इन्हीं भवनों की दीवारों पर फ्रेस्को या भित्तिचित्र के रूप में चित्रकला के विकास को हम देख सकते हैं। ऐसे चित्र (फ्रेस्को) दीवार पर चढ़े नम पलस्तर पर रंगों द्वारा बनाये जाते थे , जो मुख्य रूप से धार्मिक कथाओं पर ही आधारित होते थे। इन चित्रों में ,एक ओर विषय के विवरणों पर (डिटेलिंग) में विशेष ध्यान दिया जाता था साथ ही मनुष्य एवं पशुपक्षियों की आकृतियों को, लंबायमान या एलोंगटेड बनाया जाता था। चौदहवीं शताब्दी के यूरोप में ‘ मृत्यु की विजय’ शीर्षक चित्र बनाने के चलन,आम था। किसी व्यक्ति के स्वाभाविक मृत्यु पर अनेक दिलचस्प चित्र मिलते हैं जो प्रायः पुस्तकों में चित्रणों के रूप में छोटे आकार के होते थे। इन चित्रों में मृत्यु के रूपक के तौर पर नर-कंकाल को हाथ में भाला लिए दिखाया जाता था। ऐसे असंख्य छोटे आकार के चित्रों में हमें अभिनेता, लेखक, व्यापारी, संगीतज्ञ , नेता आदि को मृत्यु से हारते हुए दिखाया जाता था, जो कई बार हास्यपूर्ण (कॉमिकल) भी होते थे। महामारियों के दौरान, इस शीर्षक के अनेक चित्र, गिरजा घरों और मठों की दीवारों पर देखने को मिलते हैं और हर चित्र में मरते हुए लोग, एक समूह में दिखाई देते हैं। कहना न होगा, महामारी के बाद, चित्रों के माध्यम से पाप-पुण्य-मृत्यु के प्रति आम जनता के मन में एक भय का संचार कर ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ाने के उद्देश्य से ही ये ऐसे चित्र बनाये जाते थे। इन चित्रों को गौर से देखने से हम पाते हैं कि इन चित्रों में आम आदमी से लेकर राजाओं, लेखकों, पादरियों को बच्चे, बूढ़ी औरतों को मौत की चपेट में जाते दिखाया गया है। इस प्रकार इन चित्रों के ज़रिये यह सन्देश भी दिया गया है कि ‘मृत्यु किसी को नहीं बख़्शती है।”
 @अशोक भौमिक

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