साम्प्रदायिक वैमनस्य : 01

सम्प्रदायिक वैमनस्य :01

 इतिहास के पन्नों में चाहे जो दर्ज हो आम तौर पर यही माना जाता है कि हिंदुओं ने कभी किसी प्रकार के धार्मिक उत्पीड़न में भाग नहीं लिया। हालांकि इस बात के प्रमाण हैं कि शैवों ने श्रमणों का उत्पीड़न किया था और श्रमणों ने भी यदा-कदा उसका बदला लिया था। युवान च्वांग सातवीं शताब्दी में भारत आया था।उसने अपनी कश्मीर की यात्रा का विवरण लिखते हुए इसका उल्लेख किया है।इसे धार्मिक पक्षपात से प्रेरित नहीं माना जाना चाहिये।बारहवीं सदी में कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी में भी इसका उल्लेख किया है कि हूण राजा मिहिरकुल और कुछ कट्टर शैवों ने बौद्ध विहार नष्ट कर दिए और बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कर दी। इस तथ्य का उल्लेख करते हुए इस बात पर जोर दिया गया है कि मिहिरकुल हूण था। मिहिरकुल को विदेशी मानते हुए इस बात को नहीं भूलता चाहिए कि उसने गन्धार के ब्राह्मणों को अग्रहार गाँव दान में दिए थे। कलहड़ ने इस बात पर खीझ प्रकट की है कि ब्राह्मणों ने उसके दान को क्यों स्वीकार किया। वस्तुतः बौद्धों और शैव ब्राह्मणों में राज संरक्षण की होड़ थी जिसमें शैव जीत गए। यह वह समय था जब भारत और मध्य एशिया के बीच व्यापारिक सम्बंध मजबूत थे। बौद्ध व्यापारिक गतिविधियों से अभिन्नता से जुड़े हुए थे। इसी वजह से बौद्ध संघ को प्रभूत धन संपत्ति दान में मिलती थी।हूणों के आक्रमण की वजह से मध्य एशिया के साथ भारत के व्यापारिक सम्बन्धों को धक्का लगा। सम्भव है कि इस वजह से भी हूणों और बौद्धों में वैमनस्य और शत्रुता बढ़ी हो।
 _________________नीलिमा

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