लखनऊ मेल:05
कुदसिया महल
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नवाब नसीरुद्दीन हैदर(1827-37) के जमाने में एक कलाकार थे, मीर हैदर अली।वो खुद सितार वादक थे और उनकी ब्याहता कुदसिया महल नवाब साहब की खास बेगम मल्लिका-ए-जमानी(बिस्मिल्लाह बेग़म) की ख़िदमत में थी।हरम में ही नवाब साहब की मुलाक़ात कुदसिया महल से हुई जो मुहब्बत की राह गुजरते हुए दिसंबर17,1831 को निकाह तक पहुँची।कुदसिया महल बांदी से बेगम बन गईं।इस ब्याह की कानूनी अड़चन मीर हैदर अली को ठीक-ठाक मुआवजा दिया गया और शर्त रखी गई कि वह अपने समान-असबाब के साथ शहर छोड़ दें।दस्तावेज बताते है कि हैदर अली लखनऊ छोड़ अपने दोनों बच्चों के साथ कानपुर जा बसे। बहरहाल कुदसिया बेग़म की आगे की जिंदगी कुछ ख़ास खुशगवार नहीं रही और उन्होंने अगस्त21,1834 को जहर खा कर बादशाह बाग में जान दे दी।इतिहास में हरम से जुड़े हुए साक्ष्य और तथ्य कभी साफ़गोई से दर्ज़ नहीं हुए।हमेशा उनके इर्द-गिर्द रहस्य का एक जाल बुना मिलता है और वे किस्सों की तरह परिवेश में तैरते रहते हैं। कुदसिया बेग़म की आत्महत्या भी एक ऐसी ही ऐतिहासिक घटना है।जितने मुँह उतनी बात।जितने दस्तावेज उतनी वजहों की चर्चा।बहरहाल ये साफ है कि वह नवाब की चहेती बेग़म बन बैठी थी और हरम में उनके खिलाफ साजिशें की जा रही थी।मरने की वजहों में गिनाया गया है कि बेग़म नवाब को उत्तराधिकारी देने की कोशिश में जान गवां बैठीं। हरम के षड्यंत्र के चलतन वह मां नहीं बन पा रही थीं और इसी मायूसी में जान से हाथ धो बैठीं।दूसरी वजह में कहा गया है कि बेग़म अपने पहले पति से मिलती जुलती थी,जिससे नवाब नाख़ुश थे।इस वजह से भावी नवाब को जन्म देने की उत्सुक बेग़म पर बदचलनी का आरोप लगा और उनको नवाब की नज़र में गिराने की कोशिश हुई।इस सदमें में वह जान गवां बैठीं। तीसरी वजह में अपशकुन की चर्चा मिलती है।एक दफा दिलकुशा में शिकार करते हुए नवाब ने कुछ बंदरों को मार गिराया जिसका काला साया उनकी जाती जिंदगी पर पड़ा। उनके और कुदसिया बेग़म के बीच मनमुटाव और झगड़े बढ़ते गए और एक दिन तंग आकर बेग़म ने जान दे दी।कुल मिलाकर मसला बच्चे, हरम के षड़यंत्र और अपशकुन के बीच झूलता है जो उनकी मोहब्बत पर भारी पड़ा। मायूस, उदास जिंदगी का एक ही हासिल बेग़म को मिला अपनी मोहब्बत और मौत की वजह से वह नवाबों के इतिहास में ख़ास दर्ज हो गईं।
______________नीलिमा
#________नीलिमा

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