साम्प्रदायिक वैमनस्य: 05

साम्प्रदायिक वैमनस्य : 05

 साम्प्रदायिक वैमनस्य के अनेक उदाहरण इतिहास में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे हैं। साहित्य की नजर करें तो सातवीं शताब्दी के बाद रचे गए साहित्य को हम जैन और बौद्ध भिक्षुओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण पाते हैं। इन्हें बार-बार अनैतिक, बेईमान और पृथ्वी पर विष्ठा के समान बताया गया है। पल्लव शासक महेन्द्र वर्मन का मत्त विलास प्रहसन जैन भिक्षुओं के बारे में ऐसी ही राय रखता है। विशाखदत्त का मुद्रा राक्षस बराबर ये चेतावनी देता चलता है कि जैन श्रमणों से दूरी बना कर रखी जाए। उन्हें देखने से अपशगुन होता है। कृष्ण मिश्रा का प्रबोध छान्दोग्य कापालिकों को केंद्र में रखते हुए सूचना देता है कि जैन और बौद्घ भिक्षु स्त्री और मदिरा को दुर्लभ मानते हुए सदा उनके लिए लालायित रहते हैं। इनका प्रलोभन दे उन्हें आसानी से शैव बनाया जा सकता है। खजुराहो के शिव मंदिर अलग ही राग प्रस्तुत करते हैं। कुछ मंदिरों में दिगम्बर श्रमणों को बेहद भद्दी और विचित्र यौन मुद्राओं में दर्शाया गया है। साहित्य और कला से मिलने वाले ये सन्दर्भ श्रमणों के प्रति तिरस्कार की भावना प्रदर्शित करते हैं। भले ही इन्हें विशुद्ध उत्पीड़न न माना जाए पर यह निश्चित है यह जैनियों के लिए अपमान और दुःख का विषय रहा होगा। खासतौर पर तब जबकि ये सारे निंदनीय संकेत अभिजात्य वर्ग के साहित्य और स्मारकों में दर्ज हो रहे थे। अन्य उदाहरणों में तिरुनेलवेळी के एक सातवीं शताब्दी के गुहा मन्दिर को शिव मंदिर में बदलने का उल्लेख किया जा सकता है। शैव संत जन संबन्दर की प्रशंसा में कहा जाता है कि उसने पांड्य शासक को जैन धर्म से विमुख कर शिव भक्त बनाया। शासक शिव भक्ति में इतना सराबोर हुआ कि उसने आठ हजार जैनियों को मौत के घाट उतार दिया। ये पूरा प्रकरण कुछ मध्य कालीन मंदिरों में बकायदा न सिर्फ शिल्प में उकेरा गया है बल्कि हाल के वर्षों तक मंदिरों के वार्षिक समारोह में इसे अभिनीत किया जाता रहा है। इन संदर्भों को रेखांकित करने का उद्देश्य ये नहीं है कि फिर से आपस में तलवारें खींच ली जाएं। जानना ये जरूरी है कि 'अहिंसा परमो धर्म:' को अपनी विशिष्टता और परंपरा की तरह रेखांकित करने वाले हमारे समाज में इस्लाम के आगमन से पहले भी साम्प्रदयिक वैमनस्य का भाव था। दूसरे इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि शारिरिक-मानसिक हिंसा के ये उदाहरण जैनियों से जुड़े हैं जिन्होंने न केवल अहिंसा के सिद्धांत को अपने पाँच महाव्रतों में शामिल किया बल्कि अव्यवहारिकता की हद तक उसका पालन भी किया। तीसरे यह जान लेना जरूरी है कि हिन्दू धर्म जैसा कोई एकाश्म धर्म प्राचीन काल में नहीं था जो पैन इंडिया को रिप्रेजेंट करता था। सहनशीलता (टॉलरेंस) और अहिंसा को हिन्दू परम्परा की चिरंतन विशिष्टता मानने से हम जमीनी यथार्थ से दूर होते हैं। इसलिए ये जरूरी है कि हम अपने इतिहास को पूरी तटस्थता के साथ वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से पढ़े,जाने और समझे। उसे उत्तेजना फैलाने का हथियार न बनाएं। ______________नीलिमा

 तस्वीर: मत्तविलास प्रहसन/ साभार

Comments

Popular posts from this blog

तीजनबाई और पण्डवानी

🖤 छूटी आदम से जन्नत : लखनऊ रिविजिटेड - 01

विश्व की प्राचीन सभ्यताएं: नीलिमा पाण्डेय