लखनऊ मेल :04
नवाब वाज़िद अली शाह का नाम आते ही तमाम ख़ुशरंग-बदरंग ख़याल जेहन में उभर आते हैं। एक शासक के रूप में उनकी इतनी थुक्का- फ़जीहत की गई है कि लख़नऊ से आपका लगाव और जुड़ाव आपको शर्मसार कर देता है।ख़राब और गैरजिम्मेदार शासक के रूप में उन्होंने इतना नाम हासिल किया है कि जब भी आप उनके नाम के ज़िक्र से गुज़रते हैं एक लापरवाह आदमी की छवि आंखों के सामने तैर जाती है।
उनकी कुछ तस्वीरें मिलती हैं जिनको अगर ध्यान से देखा जाए तो उनमें एक किस्म का डिस्कम्फर्ट (discomfort) दिखता है। इस बाबत तफ्सील में जाने पर एक सवाल सर उठाता है कि उनको खाने-पीने, रहने-सहने की कोई तकलीफ़ तो थी नहीं फ़िर उनके वजूद में एक अलहदा किस्म की बेचैनी क्यों तारी है। जवाब ढूंढने पर नज़र एक ही जगह ठहरती है- 'कला के विभिन्न आयामों के प्रति बेहद दीवानगी'। ख़ासतौर से संगीत और नृत्य के प्रति उन्माद की हद तक दीवानापन उनके व्यक्तित्व में संतोष का अभाव लेकर आया।
वाज़िद अली शाह की बेचैनियों की वास्तविक वजह जो भी रही हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि शाह कला प्रेमी थे और गज़ब के लिख्खाड़ भी। इस गुण की तस्दीक उनके पैंसठ साला जीवन में लिखी गई सौ किताबों से होती है। उनको गद्य-पद्य, फ़ारसी-उर्दू की बेहतरीन जानकारी थी। गज़ब की कल्पना शक्ति और सृजन का हुनर रखने वाला ये नवाब दरअसल योद्धा और प्रशासक की जगह कलाकार का दिल रखता था। शासक होने की वजह से कैफ़ियत यह रही कि वह अपनी इच्छाओं को मनमाफ़िक रंग दे सके।शासक के साधनों से अपने रचनाकार की ऊर्जा का पूरा-पूरा इस्तेमाल कर सके। लेखन की पद्य शैली के उरूज़ के दिनों में उन्होंने गद्य को भी तवज्जो दी। जब फ़ारसी अभिमान बनी बैठी थी उन्होंने उर्दू को सर आंखों पर बिठाया। ये छोटी बात न थी।
उनकी तक़रीबन 40 किताबें छपीं। ज्यादातर शाही प्रेस से आईं। इनमें मसनवी, मरसिया,खिताबों का संकलन, संगीत जैसे विषयों पर लिखी पुस्तकें हैं।उनके बारे में दस्तावेजों में जो लिखत- पढ़त मिलती है उससे साफ़ है कि संगीत उनकी रूह में घुल गया था।परंपरागत हिंदुस्तानी संगीत के साथ उन्होंने नए प्रयोग किये और उसे लोकप्रिय बनाने में कोई कसर न छोड़ी। संगीत की तालीम देने वाले उनके परीखाना की खूब चर्चा मिलती है। इस चर्चा में नेकनामी और बदनामी दोनो शामिल हैं।
लखनवी भैरवी और ठुमरी को दिया गया उनका योगदान काबिलेतारीफ है। 'बाबुल मोरा नइहर छूटो ही जाए' के दर्द से हम सब वाकिफ़ हैं।'तोसे सइयाँ मैं नहीं बोलूं' की चुहल मोहक है।संगीत पर 'बनी' और 'नाजो' दो किताबें भी हैं जो उन्हें इस विधा का जानकार बताती हैं।शाह ने 'रहस' भी लिखा साथ ही उसमें अभिनय भी किया।यह उनके लोक नाट्य शैली की जानकारी और लगाव का दस्तावेज है।उनका 'रहस' भी छापे खाने तक पहुंचा। उसे हम पढ़ सकते हैं।
फ़ारसी में उन्होंने अपना 'इश्क़नामा' लिखा।इसे उन्होंने 26 बरस की उमर में लिखना शुरु किया जब उन्हें बादशाहत हासिल किए लगभग दो साल गुज़रने को थे।यह नवाब साहब के जीवन का वह यथार्थ समेटे हुये है जिसकी सर्वाधिक चर्चा की गई।उनकी कुंठा,कामुकता,इश्क़,मोहब्बत, स्त्रियों से संपर्क-संबंध,नृत्य-संगीत के प्रति लगाव का दस्तावेज है इश्क़नामा।इसमें दरकती हुई नवाबियत, उसके गिरते हुए वैभव को महसूस किया जा सकता है।बेहद जटिल और मुश्किल समय में नवाब के चुनाव, प्राथमिकताओं,नादानियों, असावधनियों को इश्क़नामा में देखा जा सकता है।
अपने कामुक व्यक्तित्व, स्त्रियों के प्रति अतिरिक्त लगाव, झुकाव,भावुकता पर नियंत्रण न रख पाने की वजह से आवाम के लाड़ले इस नवाब ने आवाम को ही भारी संकट में डाल अपने महबूब शहर को त्रासदियों के एक लंबे सिलसिले में झोंक दिया। संघर्ष की राह पर चलकर भी संभव है कि हश्र यही होता। लेकिन उस स्थिति में गरिमापूर्ण मूल्यांकन किया जाता।
नवाब वाज़िद अली शाह के व्यक्तित्व के नकारात्मक पक्षों की पूरी शिद्दत से कटु आलोचना की जानी चाहिये।लेकिन साथ ही कला और संस्कृति के प्रति उनके लगाव और योगदान को भी तवज्जो दी जानी चाहिये।बादशाहत मक्कारी मांगती है।वह ज़रूर वाज़िद अली शाह में कम रही होगी। इश्क़नामा लिखकर वह अपनी बदनामी का दस्तावेज़ हमें खुद ही मुहैया करवा गए।
________नीलिमा
________नीलिमा

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