साम्प्रदायिक वैमनस्य :04

साम्प्रदयिक वैमनस्य : 04

 इतिहास के दरीचों से झाँकने पर ऐसे अनेको उदाहरण मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि प्राचीन भारत में अनेक धर्मिक समुदाय थे जो अपनी पृथक पहचान रखते थे।प्राचीन भारत का समाज एकाश्म समाज नहीं था। न ही उस समय हिन्दू धर्म जैसे किसी धार्मिक समुदाय का कोई अस्तित्व था। हिन्दू शब्द प्राचीन साहित्य में एक विशेष भौगोलिक इकाई का द्योतक है। एकाश्म हिन्दू समाज जिसकी पहचान हिंदुत्व से है इतिहास के साथ छेड़छाड़ की कलाकारी है।यह पहले के धार्मिक सम्प्रदायों से बिलकुल अलग है।यह अपने देवताओं को इतिहास पुरूष के रूप में व्याख्यायित करता है और धर्मांतरण से भी इसे कोई परहेज नहीं है।वास्तविकता में हिन्दू धर्म का कभी कोई एक संस्थापक नहीं था। न ही इसके रेखीय विकास के कोई प्रमाण उपलब्ध हैं। सच ये है कि प्राचीन काल में यहाँ विभिन्न सम्प्रदाय सामान्य राग-द्वेष के साथ सहअस्तित्व में थे। आज तस्वीर को बदलने की कोशिश की जा रही है। जिन सम्प्रदायों ने ब्राह्मण धर्म के विचारों का खंडन किया उन्हें हिन्दू धर्म का हिस्सा बताया जा रहा है।उनकी पृथकता को अस्वीकार कर इस्लाम पूर्व भारत को एकाश्म हिन्दू धर्म के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में इतिहासकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उसका कार्य इतिहास का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण कर वर्तमान को बेहतरी के साथ गढ़ने में मदद करना है। उसे अतीत और वर्तमान में तालमेल बिठाकर न सिर्फ दोनों का विश्लेषण करना है बल्कि वर्तमान की समस्याओं को सुलझाना भी है। ये तभी सम्भव है जब जब समाज और इतिहासकार एक दूसरे पर भरोसा रखें। _________________नीलिमा

 (तस्वीर:साभार)

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