परंपरा:04
परम्परा: 04
अर्थ सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव जीवन की केंद्रीय धुरी रहा है। विनिमय का माध्यम बने धातु के टुकड़े, जिन्हें हम परिष्कृत भाषा में सिक्के कहते हैं, आर्थिक इतिहास के साथ-साथ सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन का भी महत्वपूर्ण स्रोत रहे हैं।
प्राचीन भारत से जो सिक्के मिले हैं उनमें गुप्त शासकों के सिक्के कला की कसौटी पर खरे माने जाते हैं।इन सिक्कों में अश्वमेध प्रकार का सिक्का विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसे क्रमशः दो शासकों के द्वारा जारी किया गया। समुद्रगुप्त और कुमारगुप्त।
दोनों ही शासक स्वयं को परमभागवत बताते हैं। अर्थात दोनों ही विष्णु के अन्यन भक्त हैं। वैष्णवों की छवि नितांत अहिंसक की है। इस वजह से वैष्णव शासकों के द्वारा वैदिक बलि और यज्ञ की सूचना देने वाले ये सिक्के इतिहास की एक रोचक कड़ी प्रस्तुत करते हैं।

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