लखनऊ मेल:03

बुतपरस्ती की जड़ें हमारे समाज में गहरी हैं। इसकी शुरुआत को लेकर विवाद भले ही हो लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हम एक बुतपरस्त समाज हैं। हर गली हर कूचे में मौजूद मंदिर और उनमें से ज्यादातर को हजारों बरस पुराना बताया जाना मंदिरों के सामाजिक महत्व की तस्दीक करता है। लख़नऊ शहर के तमाम मंदिरों में से एक 'मरी माता' का मंदिर कहलाता है। ये कौन सी देवी हैं? इनकी उपासना की प्राचीनता क्या है और इनको इस नाम से पुकारे जाने का आधार क्या है, कहना मुश्किल है।साहित्य में इस देवी की पहचान फ़िलहाल तो हम नहीं ढूँढ पाए हैं। देवी से परिचय बढ़ाने की गरज से जब हम पक्का पुल के पास गोमती के किनारे बने इस मंदिर पहुँचे तो अपनी धज में यह सड़क के किनारे बने किसी आम मंदिर की तरह मिला।प्राचीनता जैसी कोई बात नज़र की जद में नहीं आई। हालाँकि इस बात से प्राचीनता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता है; क्योंकि मंदिरों और पूजा स्थलों के निरंतर होने वाले जीर्णोद्धार उनसे स्मारक का ओहदा छीन लेते हैं। मंदिर सड़क से नीचे ठीक ठाक गहराई में स्थित है। तमाम सीढ़ियाँ उतर कर उस तक पहुँचा जाता है। परिसर निहायत ही आम है ऊपर सड़क पर स्थित मुखद्वार और नीचे गर्भगृह के सामने चढ़ावे की दुकानें हैं। दुकानों का ये बँटवारा साफ बताता है कि जिस धरातल पर मंदिर स्थित है उसके सामने की दुकानें पहले से चली आ रही होंगी। मंदिर के दोनों अलंग सड़क बन जाने से मंदिर और उसके अधिपत्य वाली जमीन गहराई में पहुँच गई। मंदिर की लोकेशन इस मायने में ख़ास है कि इसके आसपास तमाम नवाबी स्मारक स्थित हैं। मंदिर के पास कुछ ही कदमों की दूरी पर टीले वाली मस्जिद है। मस्जिद पार नौबतखाना, बड़ा इमामबाड़ा हैं। बेग़म हज़रत महल पार्क से मंदिर की तरफ़ ले जाने वाली सड़क पर फ़रहत बख्श, छतर मंजिल, दर्शन बिलास, जरनैल वाली कोठी से हम मुलाकात करते चलते हैं। ये सारी तारीख़ी इमारतें साफ करती हैं कि जमीन के जिस टुकड़े पर मंदिर खड़ा है उसके आसपास का हिस्सा नवाबी लख़नऊ के समय में ठीक-ठाक आबाद था।चर्चा यही है कि मंदिर नवाबों के समय का है या फ़िर उससे भी अधिक प्राचीन है। बहरहाल मंदिर का परिसर और परिवेश बेहद उचाट किस्म का मिला। बला की गंदगी फैली हुई थी।सीढियाँ उतरते हुए भिखारियों की पंगत आपका स्वागत करती है।सीढ़ियाँ उतरते-चढ़ते जिस किस्म की टिप्पड़ियाँ भिखारी समुदाय ने कीं वह भी एक नया अनुभव था। उसके विस्तार में जाना संदर्भ से कटना होगा। नीचे मंदिर परिसर में तमाम गंदगी के बीच कुछ भक्त और दो पुजारी मिले। गर्भ गृह में चढ़ावा लेते पुजारी का परिधान (पैंट-शर्ट) भी हैरत में डालने वाला था। उनसे पूछताछ कर पता चला कि मरी माता सती का रूप हैं। दक्ष शिव सती के मिथक से हम सब वाकिफ़ हैं। गर्भ गृह में तीन प्रतिमाएँ थीं। दो सामान्य देवी मूर्तियाँ और एक सिंहवाहिनी दुर्गा। पुजारी का पौराणिक आध्यात्मिक जानकारी का स्तर बहुत सीमित होने की वजह से उनसे बातचीत किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँची। बाहर एक दूसरे पुजारी मिले। उन्होंने बताया कि मंदिर रजक समुदाय के लोग सँभालते हैं। मुख्य रूप से यह उन्हीं का मंदिर है। अन्य जातियों के आने पर हालाँकि कोई प्रतिबंध नहीं है। इस समुदाय के जिक्र से अनायास ही हमारी दृष्टि उनके निहायत मैले कपड़ों पर चली गई। मंदिर परिसर के पूरे परिवेश में एक किस्म की घुटन थी। वजह समझने में वक़्त लगा। पीछे के हिस्से में कुछ बकरे मिले। संशय हुआ कि यहाँ बलि भी देते हैं क्या? चूँकि पशु बलि भी धीमे-धीमे प्रतिबंधित हो चली है इसलिए जिज्ञासा बढ़ गई। इधर-उधर खोजी नज़रों से ढूंढने पर कुछ नहीं दिखा। लेकिन वापस सड़क पर लौट कर ऊँचाई से बलि का मंजर भी दिख गया। पास में पान की दुकान वाले ने विस्तार से बता दिया कि 'हाँ बलि दी जाती है। मन्नत पूरी होने पर भक्त चढ़ावा करते हैं और आंशिक हिस्सा देवी को समर्पित कर शेष प्रसाद की तरह अपने साथ ले जाते हैं'। जितना देखा समझा उससे कुल मिलाकर यही लगता है कि किसी समय नदी के किनारे यह किसी छोटी मोटी देवी का ठीहा रहा होगा, जहाँ रजक समुदाय के लोग मन्नत पूरी होने पर बलि देते रहे होंगे। वक़्त बीतने के साथ देवी के चारो तरफ़ दीवार खड़ी हो गई और वह मंदिर में कैद हो गईं। संस्कृतिकरण की प्रक्रिया से गुजरते हुए वह हिन्दू धर्म के आराध्य शिव की जीवन संगिनी सती के साथ अभिन्नता से जुड़ गईं और सती शब्द की डोर थाम मरी माता कहलाईं। मरी माता का यह आंशिक विश्लेषण इस संज्ञा वाले सभी मंदिरों पर लागू होगा कहना मुश्किल है। सड़क मार्ग से परिवहन करते हुए मरी माता के अनेक मंदिर दिखते हैं। लेकिन उनकी अधिष्ठात्री देवी कौन सी हैं , उनके नाम की परिपाटी क्या है इसकी पड़ताल अभी बाकी है। उत्तर प्रदेश के जिलों-कस्बों का सफ़र करते हुए जगह-जगह एक ख़ास नाम वाले मंदिर टकराते हैं- 'मरी माई का मंदिर' । नाम से ऐसा ध्वनित होता है कि इनका संबंध सती प्रथा से है। अभी तक जो मंदिर हमने देखे हैं वो या तो किसी नदी-नाले के पास बनाये गए हैं या फिर गाँव के बाग़ या सीवान में स्थित हैं। इन मंदिरों के बाबत किसी के पास कोई जानकारी हो तो साझा करें।
__________नीलिमा

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