परंपरा:03

परम्परा : 03 अहिंसा,सहिष्णुता / टॉलरेन्स, वसुधैव कुटुम्बकम को भारतीय परंपरा और अस्मिता के रूप में देखा जाता है। हालांकि व्यवहार में ऐसा बहुत कुछ घटता रहता है जो सीधे-सीधे परम्परा के इन संदर्भो को खारिज कर देता है। शहरों, जगहों संस्थाओ को नए नाम देना एक तरह उनके इतिहास को नकारना ही है। पिछले दिनों घटे कुछ वाकये परम्परा को लेकर हमारे दृष्टिकोण पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। ये सच है कि शहर हमारे दिलों में धड़कते हैं, स्मृतियों में बसते हैं,नज़रों में ख़ूबसूरती से कैद होते हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि कागज़ पर लिखे गए उनके नाम गैरज़रूरी हैं।उनके ख़ास मायने है।वह इतिहास में दर्ज़ होते हैं।दस्तावेजों का अपना महत्व होता है। जगहों के नाम बदलने के, इतिहास में उन बदले हुए नामों के दर्ज़ होने के अपने माक़ूल कारण होते हैं जो किसी विशेष ऐतिहासिक घटनाक्रम से जुड़ते हैं न कि किसी सिरफ़िरे जुनून की उपज। किसी के बच्चे को छीनकर उसका नाम बदला जाता है क्या? लेकिन जिस समाज में ब्याह के बाद स्त्रियों के नाम ससुराल में बदलने की परंपरा हो उसमें कितनी अधिक जटिलताएं होंगी समझा जा सकता है। शहर का नाम इला पर हो,इलाही पर हो या अल्लाह पर हो कोई भी दलील उसको बदलने के पक्ष में खड़ी नहीं होती।प्रयाग,कोसम,कोशांबी के संदर्भ भी तर्कहीन हैं। नाम से पहचान का संदर्भ जुड़ा होता है।पहचान थोपी नहीं जाती अर्जित की जाती है।इतिहास रचा जाता है मिटाया नहीं जाता।
 ______________नीलिमा
 तस्वीर:आरकाईव्स

Comments

Popular posts from this blog

तीजनबाई और पण्डवानी

🖤 छूटी आदम से जन्नत : लखनऊ रिविजिटेड - 01

विश्व की प्राचीन सभ्यताएं: नीलिमा पाण्डेय