साँची:01

हिंदुस्तान के इतिहास से जुड़ी हुई तमाम ऐसी जगहें आज भी बची हुई हैं जहाँ इतिहास को अपने नन्हें कदमों से पइयां-पइयां चलते हुए देखा जा सकता है।इनमें से कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहाँ इतिहास के कदमों के निशान बेहद ताजा और नम हैं। उनके गीलेपन से ऐसा लगता है जैसे अभी-अभी वक़्त वहाँ से गुजरा हो। मोहेंजोदड़ो  एक ऐसी ही जगह है। रूबरू हुए बिना ही जहाँ कहीं भी उसके बारे में पढ़ो शहर जिंदा होने लगता है। उससे मिलना तमाम बची रह गयी हसरतों में से एक है।

फ़िलहाल हम साँची में हैं,बुद्ध के पदचिन्हों पर उन्हें एक ऐसी  जगह तलाशते हुए जहाँ वे कभी गए ही नहीं। बुद्ध से जुड़े हुए पुरास्थल इस मामले में अलहदा हैं। ये एक ही समय में धार्मिक और  ऐतिहासिक दोनों हैं। बुद्ध मानव होकर भी क्रमशः मानवेतर होते गए। यही वजह है कि कुछ स्थल ऐतिहासिक बुद्ध को समर्पित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो बौद्ध धर्म के तीर्थ हैं, मानवेतर बुद्ध से अभिन्न हैं। साँची उनमें से एक है। साँची बुद्ध को समर्पित है लेकिन इतिहास का कोई पढ़ने वाला यहाँ बुद्ध से अधिक अशोक से जुड़ाव महसूस कर सकता है। साँची में खड़े हम इस बात को  शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। साँची इतिहास का एक ऐसा लम्हा है जिसे मौर्य शासक अशोक ने पैदा किया। साँची की कहानी के किरदार बुद्ध हैं,कहानी की धुरी, उसके ख़ास नायक लेकिन कहानी की बुनावट, कसावट और उसके विस्तार के लिए अशोक जिम्मेदार है। यही वजह है कि साँची में अशोक बुद्ध से अधिक याद आते हैं। अशोक पर साँची ठहरी नहीं , आगे बढ़ी।साँची में तमाम बरसों तक धर्म का चक्का घूमता रहा। इस घुमाव का पहला चक्कर अशोक के परिश्रम से तय हुआ। इसीलिए साँची में दृश्य बुद्ध के साथ बहुधा अदृश्य अशोक मौजूद हैं।वह परछाईं की तरह बुद्ध के साथ-साथ चलते हैं।
____________________नीलिमा
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