साँची:03
अशोक के कदमों के निशान साँची में मौजूद हैं। उसका एक स्तंभ यहां देखा जा सकता है। एकाश्म, ओपदार पॉलिश युक्त लाल बलुआ पत्थर से बना। अशोक के स्तंभों की एकरूपता उनकी विशेषता है। आप पहचानने में कभी भूल नहीं कर सकते। मगध में बैठे अशोक ने साँची को क्यों चुना होगा? यह सवाल बार-बार मन में आता है। दरअसल अशोक ने प्रशासन का 'क ख ग घ' उज्जैनी से सीखा। वह युवराज की हैसियत से उज्जयिनी का प्रांतीय गवर्नर नियुक्त था। उज्जैन के रास्ते में उसकी पहचान विदिशा से हुई और इस सफ़र में उसे एक हमसफ़र भी मिला। इस वजह से पहचान गहरी होकर रिश्ते की डोर में बंध गई । विदिशा के श्रेष्ठी की पुत्री के साथ अशोक ने ब्याह कर लिया। यहीं से साँची का इतिहास लिखने की शुरुआत हुई।साँची अशोक के जीवन में पहले आया, बुद्ध की दस्तक बाद की है । इस तरह साँची से अशोक की पहचान बुद्ध के साथ उसकी पहचान से पुरानी ठहरती है। उज्जैन के रास्ते में श्रेष्ठी- पुत्री देवी और सांची के साथ होने वाली अशोक की मुलाकात कालक्रम में इतिहास बन गई ।
262 ईसा पूर्व में होने वाले कलिंग के युद्ध ने इस इतिहास को लिखने के लिए स्याही उपलब्ध करवाई। कलिंग के युद्ध को निर्णायक तरीके से जीतकर भी अशोक अपना मन हार गया । हारे हुए मन के साथ उसने उसने अपना संयम नहीं खोया, जिम्मेदारियों से वैराग्य नहीं लिया ,सधुआया नहीं। बल्कि जिम्मेदारियों की तेजधार पर करीने से चलते हुए वह अपने मानसिक त्रास से उबरा। उबरने में उसकी मदद गौतम ने की। अशोक ने अपनी गलतियों के आईने में अपने चेहरे पर पड़े खून के छीटों को देखा और बार-बार देखा। उनको धो-पोंछकर सुंदर- चिक्कन बनाने की जगह उसने अपना विकृत और वीभत्स चेहरा दुनिया के सामने रखा। अपनी क्रूरता, हताशा, निराशा को उसने खुद ही अपने अभिलेख में दर्ज करवा दिया जिससे कि लोग उसे पढ़ें, जाने और मूल्यांकन कर जीवन जीने के सही रास्ते का चुनाव करें। अपने भीतर की इस लड़ाई में अशोक गौतम बुद्ध का हाथ मजबूती के साथ थाम कर आगे बढ़ा। अहिंसा और करुणा के अस्त्रों के सहारे अंततः वह विजेता हुआ। इस विजय से अभिभूत बुद्ध के प्रति आभार दर्शाते हुए उसने बुध का स्तूप बनवाया। यह साँची की जमीन पर बुद्ध के आलोक के प्रदीप्त होने की शुरुआत थी जिसकी रोशनी की पहली किरण अशोक के माध्यम से पहुँची। अशोक का स्तंभ साँची स्तूप(01) के बिल्कुल बाजू में है। इसलिए वहां अशोक की उपस्थिति को लेकर कोई संदेह नहीं बचता ।
संवेदना से लबरेज अशोक का व्यक्तित्व भावुकता से दूर था। भावुकता पैर की बेड़ियां बनती है जबकि संवेदना व्यक्तित्व को विस्तार देती है, दूरदृष्टि का विकास करती है। अशोक ने जिम्मेदारियों से मुंह न मोड़ कर अपनी जनता में संवेदना के संचार को अपना उत्तरदायित्व माना। वह टसुए बहाता अहिंसा की चादर ओढ़ किसी खोह में नहीं छुप गया। बल्कि उसने बार-बार अपना मूल्यांकन किया और यह विश्लेषित करने का प्रयास किया कि कैसे जनता को संवेदना और करुणा के क़रीब पहुँचाया जाए। उसने विचार किया होगा कि जनता को संवेदनशील बनाने का कार्य ईश्वर और धर्म की परिधि में बेहतर तरीके से किया जा सकता है। कुशल प्रशासक होने की वजह से उसे इस बात के कारगर होने का अनुमान रहा होगा। उसने यह काम बेहद जनतांत्रिक तरीके से किया जिससे जनता की धार्मिक भावनाएं भी आहत ना हों और वह करुणा के महत्व को समझ सके।
उसके द्वारा प्रतिपादित धम्म के अंतर्गत व्याख्यायित निर्देशों में बौद्ध धर्म का प्रभाव तो जरूर है पर कहीं भी बौद्ध धर्म को अंगीकार करने की बात नहीं कही गई है।
उस जमाने में जब संचार के संदर्भ बेहद प्राथमिक थे अशोक ने यातायात और आवागमन के उन मार्गों को अपने संदेश लिखवाने के लिए चुना जिन पर आवाम की आवाजाही अधिक थी, व्यापारिक एवं वाणिज्यिक गतिविधियों की आवृत्ति अधिक थी। सांची एक ऐसी ही जगह थी। विराट जीवन तथा साधना के लिए उपयुक्त, शांत वातावरण एवं विदिशा जैसी समृद्ध नगरी के पास होने के कारण साँची का अपना महत्व था । साँची के दान अभिलेख इस बात पर मुहर लगाते हैं। दान अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि यहां की समृद्धि और फलने-फूलने में विदिशा के व्यापारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी धार्मिक श्रद्धा और सद्भावना का लाभ साँची को मिला। बेतवा (वेत्रवती)और बेस नदी के संगम पर होने के कारण साँची दो महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों की संधि पर स्थित था। विदिशा उस जमाने में वाणिज्य का प्रसिद्ध केंद्र था।उसकी समृद्धि और सहयोग से मौर्यों के बाद भी साँची कई शताब्दियों तक जीवित रहा। व्यापारियों ने उसकी देखभाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस तरह मध्य गंगा की घाटी से निकल कर अशोक का हाथ थामे बुद्ध मालवा की विंध्य पर्वत शृंखला की पहाड़ी पर पहुँचते हैं। यहाँ से वह महेंद्र के साथ श्रीलंका की राह तय करते हैं। महेंद्र अशोक और देवी के पुत्र हैं। बाद में महेंद्र की भगिनी संघमित्रा उनकी हमराही बनती हैं।
साँची और श्रीलंका के बीच की डोर आज भी मजबूत है। साँची में सिंघली वर्चस्व देखा जा सकता है। तमाम बौद्ध स्थलों का विस्तृत ब्यौरा देने वाले ह्वेनसांग ने साँची को लेकर चुप लगा रखी है। कहीं कोई जिक्र सी-यू-की में नहीं है। महावंश जरूर 'चेतियगिरी' की संज्ञा के साथ साँची का उल्लेख करता है। साँची को इतिहास में जिंदा रखने का काम श्रीलंका ने ही किया।
__________________नीलिमा
#neelimapandey22
#साँची03
262 ईसा पूर्व में होने वाले कलिंग के युद्ध ने इस इतिहास को लिखने के लिए स्याही उपलब्ध करवाई। कलिंग के युद्ध को निर्णायक तरीके से जीतकर भी अशोक अपना मन हार गया । हारे हुए मन के साथ उसने उसने अपना संयम नहीं खोया, जिम्मेदारियों से वैराग्य नहीं लिया ,सधुआया नहीं। बल्कि जिम्मेदारियों की तेजधार पर करीने से चलते हुए वह अपने मानसिक त्रास से उबरा। उबरने में उसकी मदद गौतम ने की। अशोक ने अपनी गलतियों के आईने में अपने चेहरे पर पड़े खून के छीटों को देखा और बार-बार देखा। उनको धो-पोंछकर सुंदर- चिक्कन बनाने की जगह उसने अपना विकृत और वीभत्स चेहरा दुनिया के सामने रखा। अपनी क्रूरता, हताशा, निराशा को उसने खुद ही अपने अभिलेख में दर्ज करवा दिया जिससे कि लोग उसे पढ़ें, जाने और मूल्यांकन कर जीवन जीने के सही रास्ते का चुनाव करें। अपने भीतर की इस लड़ाई में अशोक गौतम बुद्ध का हाथ मजबूती के साथ थाम कर आगे बढ़ा। अहिंसा और करुणा के अस्त्रों के सहारे अंततः वह विजेता हुआ। इस विजय से अभिभूत बुद्ध के प्रति आभार दर्शाते हुए उसने बुध का स्तूप बनवाया। यह साँची की जमीन पर बुद्ध के आलोक के प्रदीप्त होने की शुरुआत थी जिसकी रोशनी की पहली किरण अशोक के माध्यम से पहुँची। अशोक का स्तंभ साँची स्तूप(01) के बिल्कुल बाजू में है। इसलिए वहां अशोक की उपस्थिति को लेकर कोई संदेह नहीं बचता ।
संवेदना से लबरेज अशोक का व्यक्तित्व भावुकता से दूर था। भावुकता पैर की बेड़ियां बनती है जबकि संवेदना व्यक्तित्व को विस्तार देती है, दूरदृष्टि का विकास करती है। अशोक ने जिम्मेदारियों से मुंह न मोड़ कर अपनी जनता में संवेदना के संचार को अपना उत्तरदायित्व माना। वह टसुए बहाता अहिंसा की चादर ओढ़ किसी खोह में नहीं छुप गया। बल्कि उसने बार-बार अपना मूल्यांकन किया और यह विश्लेषित करने का प्रयास किया कि कैसे जनता को संवेदना और करुणा के क़रीब पहुँचाया जाए। उसने विचार किया होगा कि जनता को संवेदनशील बनाने का कार्य ईश्वर और धर्म की परिधि में बेहतर तरीके से किया जा सकता है। कुशल प्रशासक होने की वजह से उसे इस बात के कारगर होने का अनुमान रहा होगा। उसने यह काम बेहद जनतांत्रिक तरीके से किया जिससे जनता की धार्मिक भावनाएं भी आहत ना हों और वह करुणा के महत्व को समझ सके।
उसके द्वारा प्रतिपादित धम्म के अंतर्गत व्याख्यायित निर्देशों में बौद्ध धर्म का प्रभाव तो जरूर है पर कहीं भी बौद्ध धर्म को अंगीकार करने की बात नहीं कही गई है।
उस जमाने में जब संचार के संदर्भ बेहद प्राथमिक थे अशोक ने यातायात और आवागमन के उन मार्गों को अपने संदेश लिखवाने के लिए चुना जिन पर आवाम की आवाजाही अधिक थी, व्यापारिक एवं वाणिज्यिक गतिविधियों की आवृत्ति अधिक थी। सांची एक ऐसी ही जगह थी। विराट जीवन तथा साधना के लिए उपयुक्त, शांत वातावरण एवं विदिशा जैसी समृद्ध नगरी के पास होने के कारण साँची का अपना महत्व था । साँची के दान अभिलेख इस बात पर मुहर लगाते हैं। दान अभिलेखों से यह स्पष्ट है कि यहां की समृद्धि और फलने-फूलने में विदिशा के व्यापारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी धार्मिक श्रद्धा और सद्भावना का लाभ साँची को मिला। बेतवा (वेत्रवती)और बेस नदी के संगम पर होने के कारण साँची दो महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों की संधि पर स्थित था। विदिशा उस जमाने में वाणिज्य का प्रसिद्ध केंद्र था।उसकी समृद्धि और सहयोग से मौर्यों के बाद भी साँची कई शताब्दियों तक जीवित रहा। व्यापारियों ने उसकी देखभाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस तरह मध्य गंगा की घाटी से निकल कर अशोक का हाथ थामे बुद्ध मालवा की विंध्य पर्वत शृंखला की पहाड़ी पर पहुँचते हैं। यहाँ से वह महेंद्र के साथ श्रीलंका की राह तय करते हैं। महेंद्र अशोक और देवी के पुत्र हैं। बाद में महेंद्र की भगिनी संघमित्रा उनकी हमराही बनती हैं।
साँची और श्रीलंका के बीच की डोर आज भी मजबूत है। साँची में सिंघली वर्चस्व देखा जा सकता है। तमाम बौद्ध स्थलों का विस्तृत ब्यौरा देने वाले ह्वेनसांग ने साँची को लेकर चुप लगा रखी है। कहीं कोई जिक्र सी-यू-की में नहीं है। महावंश जरूर 'चेतियगिरी' की संज्ञा के साथ साँची का उल्लेख करता है। साँची को इतिहास में जिंदा रखने का काम श्रीलंका ने ही किया।
__________________नीलिमा
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