साँची:02

अशोक की उपाधि 'प्रियदर्शी' है।उसके अभिलेख लयबद्ध 'देवानाम पिये पियदसि लाजा हेवं अहा' से शुरू होते हैं।ज्यादातर अभिलेख इसी तर्ज पर हैं जिसका अर्थ है  'देवताओं का प्रिय प्रियदर्शी राजा कहता है..' 

'प्रियदर्शी' होने के बावजूद अशोक की पहचान लम्बे समय तक संदिग्ध रही। तमाम मेहनत-मशक्क़त के साथ उसके अभिलेख पढ़े गए । बावजूद इसके 'प्रियदर्शी' को चिन्हित न कर पाना निराशाजनक था। इस निराशा से हमें मास्की अभिलेख उबारता है जहाँ राजा  का नाम 'अशोकस' लिखा मिलता है।  इसी के साथ 'प्रियदर्शी' की गुत्थी सुलझ जाती है। अब हम अशोक को दीपवंश,महावंश के साथ-साथ अभिलेखों के आलोक में देख सकते हैं। ये आलोक पहले के साहित्यिक उजाले से बेहतर है। इसमें अहिंसा का दीप सार्थकता के साथ प्रज्वलित है। पहले अशोक राजा था, बौद्ध धर्मानुयायी था । अब इस नए आलोक में वह एक इंसान है। मानवीय, करुण, हमारे-आपके जैसा।

अभिलेख अशोक और हमारे बीच के अपनेपन को गाढ़ा करते हैं।  पहले भी वह हमारे ही थे लेकिन सिंघली साहित्य में उपलब्ध उनके ब्यौरे में एक किस्म की अजनबियत थी। दीपवंश, महावंश श्रीलंकाई थाती हैं। अशोक के अभिलेखों के मिलने और उद्वाचित होने से पहले हमारे सबसे महान और मानवीय शासक से जुड़ा हुआ स्पष्टता से दर्ज़ इतिहास हमारे पास नहीं था।  इस दृष्टिकोण से अभिलेख अशोक को हमारा करीबी बनाते  हैं और हमारा मान भी बढ़ाते हैं।अभिलेखों में पहली बार अशोक का इतिहास कपोल-कल्पित, अतिरंजित किस्सों से बाहर साँस लेता है।

अव्वल तो अशोक से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।लेकिन एक छोटा सा फलसफ़ा जो उसके व्यक्तित्व को अलहदा बनाता है वह है, 'जिओ और जीने दो'।इस मुख्तसर सी बात ने अशोक को शासकों की भीड़ से अलग खड़ा कर नायक बना दिया। यही नायकत्व अशोक को  गौतम बुद्ध से जोड़ता है। अशोक के हिंसक व्यक्तिव में 'अ' का प्रत्यय बुद्ध ने ही जोड़ा। अपने समय में अहिंसा की पैरोकारी करने वाले बुद्ध अकेले नहीं थे। महावीर स्वामी इस रास्ते में उनके सहयात्री थे। बुद्ध का जोर अहिंसा के साथ-साथ करुणा पर भी था। अहिंसा और करुणा में बेहद बारीक पर गहरा अंतर है। इसीलिए बुध्द लोकप्रियता में महावीर स्वामी से दो कदम आगे निकल जाते हैं।

राजनीतिक इतिहास में अहिंसा का पहला सबक हम अशोक से सीखते हैं और दूसरा महात्मा गांधी से। अशोक को हमने 'महान' का विरुद दे रखा है तो गांधी जी को 'महात्मा' का। हिंदुस्तान के इतिहास में चौदह विक्रमादित्यों के बरक्स दो ही 'महान' शासक हैं अशोक और अकबर, तीसरा कोई नहीं है। लेकिन गाँधी जी 'महात्मा' के विरुद के अकेले हकदार हैं। ये दोनों ही हमारे इतिहास के महत्वपूर्ण किरदार हैं।

अशोक और महात्मा गाँधी से हमारा सानिध्य गहरा है।खीसे में रखे रोकड़े पर दोनों मौजूद हैं। अशोक की लाट को हमने नेशनल इम्ब्लेम बना रखा है। गाँधी जी का दर्जा राष्ट्रपिता का है। इस सानिध्य का हमारे वजूद पर कितना असर है ये काबिलेगौर है। प्रतीकात्मक सम्मान का महत्व  तभी तक है जब तक हम उस कारक को व्यवहार में लाते हैं जो दिए गए मान के मूल में है।  यदि ऐसा नहीं है तो प्रतीक रूढ़ होकर अपना व्यवहारिक अर्थ खो देते हैं।

साँची के स्मारक वास्तु कला के अध्ययन के दृष्टिगत महत्वपूर्ण हैं लेकिन उनका गढ़े जाने के पीछे की वजह उनको  जीवित इतिहास से जोड़ती है। स्तूप कब बने?कैसे बने? किसने बनवाये ? ये सारे सवाल और उनके  जवाब इतिहास का अभिन्न हिस्सा हैं । लेकिन 'स्तूप क्यों बने' ? इस सवाल का जवाब अपने आप में इतिहास है जो हमें हमारी मिट्टी से जोड़ता है। परिष्कृत भाषा में इसे  हम अपनी संस्कृति से जुड़ना कहते हैं। संस्कृति की डोर में पिरोये गए नगीनों की तरह बुद्ध,अशोक और गाँधी इतिहास के अलग-अलग काल खंडों में जगमगा रहे हैं। इस जगमग का नूर अहिंसा और करुणा से है जिसकी आभा में साँची का पूरा  परिवेश प्रदीप्त है।
____________________नीलिमा
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