रामकथा और हम-03

अलेक्जेंडर कनिंघम का भारतीय पुरातत्व को महत्वपूर्ण योगदान रहा है है। यही वजह है कि हम उन्हें भारतीय पुरातत्व का जनक मानते हैं। कनिंघम ने दुरूह परिस्थितियों में भी न सिर्फ़ इतिहास और  पुरातत्व के प्रति अपने लगाव को बनाए रखा बल्कि किये गए अन्वेषण को प्रकाशित करने के उत्तरदायित्व को भी बखूबी निभाया।

उनकी पुस्तक 'Ancient Geography of India' में रामबकीय (Rambakia) नामक एक स्थान का उल्लेख मिलता है। यूनानी योद्धा सिकंदर के समय इस स्थान का अस्तित्व था। इतिहासकार एरियन ने इसका उल्लेख किया है। यह अफगानिस्तान का एक छोटा सा गाँव है। चीनी यात्री युवान च्वांग (Huein Tsang) के हवाले से कनिंघम ने बताया है कि 629-645 ईसवी के दरम्यान की गई अपनी यात्रा के दौरान  युवान च्वांग ने पाया कि वहाँ के लोग राम से परिचित थे। हालाँकि उनके राम वाल्मीकि के राम से कुछ अलग थे।

 रामबकीय नाम के इस स्थान को कुछ विद्वान राम की जन्मभूमि से जोड़ते हैं।इसकी वजह ये है कि जो लोग राम की ऐतिहासिकता में यकीन रखते हैं वह राम की तिथि 2000 ईसा पूर्व के आसपास तय करके चलते हैं।

यह इस आधार पर किया जाता है कि राम दाशरथि महाभारत के युद्ध के लगभग 65 पीढ़ियों पहले हुए थे। महाभारत के युद्ध का समय 1000 ईसापूर्व अनुमानित है। इसलिए हमारे सामने  पर्याप्त रूप से अयोध्या के बसने और अयोध्या के राम के बीच 1000 वर्षों से अधिक का अंतर आता है। इसी कठिनाई की वजह से कुछ विद्वान अयोध्या को अफगानिस्तान में ढूंढते हैं।
_______________नीलिमा
(तस्वीर:सरयू)

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