राम कथा और हम-10

ऐतिहासिक रूप से माना जाता है कि वाल्मीकि ने जिस समय अपने काव्य की रचना की उस समय बौद्ध धर्म अपने उरूज पर था और नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाता हुआ ब्रह्मचर्य और सन्यास पर बल दे रहा था।वाल्मीकि का काव्य इससे उलट था।उसका रुझान सांसारिक जीवन पर था। इसमें पारिवारिक जीवन का बखान था।पारिवारिक सम्बन्धों के आदर्श रूप प्रस्तुत किये गए थे।माता,पिता, भ्राता,पत्नी ,पुत्र,मित्र सभी अपने आदर्शतम रूप में वाल्मीकि के काव्य में मिलते हैं जो अनुकरणीय हैं,प्रशंसनीय हैं। जिनका महिमामंडन करते हुए वाल्मीकि अघाते नहीं हैं। यह एक ऐसी मोहक गाथा है जो अपनी नाटकीयता से न सिर्फ़ हमें द्रवित करती है बल्कि रिझा-रिझा कर उर में समा जाती है। यह वर्णव्यवस्था पर आधारित पितृसत्तात्मक समाज के ढांचे पर विकसित एक बेहद  मोहक काव्य है जो बड़ी ही कुशलता के साथ पितृसत्तात्मक मूल्यों की बुनियाद रखता है। उन्हें लोकप्रिय बनाता है। इसका समय 300 ईसा पूर्व से 200 ईसवी के बीच का माना जाता है। अंतिम खंड जरूर प्रक्षिप्त  हैं।बहरहाल 200 ईसवी के अंत तक हम  वाल्मीकि के काव्य को जनमानस के पटल पर अंकित पाते हैं। उसकी लोकप्रियता में कोई संदेह नहीं बचता।
_____________नीलिमा

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