राम कथा और हम -02
बस्तर के आदिवासी समाज में दशहरा का विशिष्ट स्थान है। बस्तर के लोगों के लिए यह कोई आम पर्व नहीं है। यह विश्व का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला पर्व है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाया जाने वाला दशहरा पूरे 75 दिन तक मनाया जाता है। बस्तर के लोग 600 साल से यह पर्व मनाते चले आ रहे हैं। यहां मनाया जाने वाला दशहरा पर्व इसलिए भी अूनठा है क्योंकि बस्तर ही एकमात्र जगह है जहां दशहरे पर रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता। यह पर्व बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ा हुआ है। यह संगम है बस्तर की संस्कृति, राजशाही, सभ्यता और आदिवासी के आपसी सद्भावना का।
आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी इस पर्व को विशिष्ट बनाती है। आदिवासियों ने प्रारंभिक काल से ही बस्तर के राजाओं को हर तरह से सहयोग दिया। इसका परिणाम यह निकला कि बस्तर दशहरा एक ऐसी परंपरा के रूप में विकसित हुआ जिस पर आदिवासी समुदाय ही नहीं बल्कि क्षेत्र की पूरी आवाम गर्व करती है।
बस्तर राज्य के समय परगनिया, मांझी, मुकद्दम, कोटवार व ग्रामीण दशहरे की व्यवस्था में समय से पहले ही जुट जाया करते थे। आज यह व्यवस्था शासन-प्रशासन करता है लेकिन पर्व का मूलस्वरुप आज भी वैसा ही बना हुआ है।
आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी इस पर्व को विशिष्ट बनाती है। आदिवासियों ने प्रारंभिक काल से ही बस्तर के राजाओं को हर तरह से सहयोग दिया। इसका परिणाम यह निकला कि बस्तर दशहरा एक ऐसी परंपरा के रूप में विकसित हुआ जिस पर आदिवासी समुदाय ही नहीं बल्कि क्षेत्र की पूरी आवाम गर्व करती है।
बस्तर राज्य के समय परगनिया, मांझी, मुकद्दम, कोटवार व ग्रामीण दशहरे की व्यवस्था में समय से पहले ही जुट जाया करते थे। आज यह व्यवस्था शासन-प्रशासन करता है लेकिन पर्व का मूलस्वरुप आज भी वैसा ही बना हुआ है।

Comments
Post a Comment