राम कथा और हम-01
इतिहास के अध्ययन में हम प्राचीन से अर्वाचीन की तरफ़ क्रमशः बढ़ते हैं।साहित्य में अयोध्या का उल्लेख ढूंढ़ते हुए हम अथर्ववेद तक पहुँचते हैं। अथर्ववेद का समय 1000-800 ईसा पूर्व माना जाता है। अयोध्या का प्राचीनतम उल्लेख हमें अथर्ववेद में मिलता है (X2.31-33)। यहाँ इसे देवताओं की नगरी बताया गया है जिसमें 09 प्रवेश द्वार हैं। संयुक्त निकाय जो 300 ईसा पूर्व का पाली ग्रन्थ है अयोध्या को गंगा के किनारे बसा नगर बताता है। गंगा और सरयू में कोई भरम है इसे निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। आरंभिक पाली ग्रंथ कई नदियों से परिचित दिखते हैं।वे गंडक, निरंजना आदि का उल्लेख भी करते हैं। सरयू का उल्लेख भी इन गर्न्थो में सरभू के रूप में मिलता है। हालांकि उसे अयोध्या से नहीं जोड़ा गया है।
मुनीश चंद्र जोशी (ASI) ने अयोध्या की तलाश में वाल्मीकि रामायण के संदर्भ को आधार बनाया। उन्होंने अयोध्या को सरयू से कुछ दूरी पर ढूंढा। वाल्मीकि रामायण का उत्तरकाण्ड ईसा की आरंभिक शताब्दियों में रचा गया। उसमे अयोध्या और सरयू के बीच की दूरी 6 कोस अथवा 12 मील बताई गई है। लेकिन वर्तमान अयोध्या सरयू के तट पर है इसलिए इतिहास पढ़ते समय यह सूचना दुविधा में डालती है।
सरयू पूरब की तरफ़ बढ़ते हुये बलिया और सारन जिले में घाघरा कहलाती है। सारन जिले में यह गंगा में खो जाती है। सरयू के मार्ग बदलते रहने की प्रवृत्ति के कारण कुछ विद्वान बलिया के खैराडीह इलाके को अयोध्या मानना चाहते है।
चीनी यात्री युवान च्वांग का विवरण भी हमें दुविधा में डालता है। सी-यू-की की सूचना के अनुसार सातवीं शताब्दी में अयोध्या में बौद्ध धर्म का प्रभुत्व था। युवान-च्वांग अयोध्या में ब्राह्मणों की उपस्थिति से इंकार नहीं करता है।किन्तु उसने विहारों और मंदिरों कस जो अनुपात बताया है(100:10) वह मन्दिरों की कमजोर स्थिति दर्शाता है।
परंपरा से अयोध्या में जैनियों की भी उपस्थिति बताई गई है।इसे कई जैन तीर्थंकरों का जन्म स्थान माना गया है। अयोध्या को जैन ग्रन्थ कोसल की राजधानी बताते हैं लेकिन उसकी सुनिश्चित भौगोलिक स्थिति पर प्रकाश नहीं डालते।
गुप्त काल (319-550 ईसवी) के बाद ही साहित्य में राम को वर्तमान अयोध्या से अभिन्न किया गया।
मुनीश चंद्र जोशी (ASI) ने अयोध्या की तलाश में वाल्मीकि रामायण के संदर्भ को आधार बनाया। उन्होंने अयोध्या को सरयू से कुछ दूरी पर ढूंढा। वाल्मीकि रामायण का उत्तरकाण्ड ईसा की आरंभिक शताब्दियों में रचा गया। उसमे अयोध्या और सरयू के बीच की दूरी 6 कोस अथवा 12 मील बताई गई है। लेकिन वर्तमान अयोध्या सरयू के तट पर है इसलिए इतिहास पढ़ते समय यह सूचना दुविधा में डालती है।
सरयू पूरब की तरफ़ बढ़ते हुये बलिया और सारन जिले में घाघरा कहलाती है। सारन जिले में यह गंगा में खो जाती है। सरयू के मार्ग बदलते रहने की प्रवृत्ति के कारण कुछ विद्वान बलिया के खैराडीह इलाके को अयोध्या मानना चाहते है।
चीनी यात्री युवान च्वांग का विवरण भी हमें दुविधा में डालता है। सी-यू-की की सूचना के अनुसार सातवीं शताब्दी में अयोध्या में बौद्ध धर्म का प्रभुत्व था। युवान-च्वांग अयोध्या में ब्राह्मणों की उपस्थिति से इंकार नहीं करता है।किन्तु उसने विहारों और मंदिरों कस जो अनुपात बताया है(100:10) वह मन्दिरों की कमजोर स्थिति दर्शाता है।
परंपरा से अयोध्या में जैनियों की भी उपस्थिति बताई गई है।इसे कई जैन तीर्थंकरों का जन्म स्थान माना गया है। अयोध्या को जैन ग्रन्थ कोसल की राजधानी बताते हैं लेकिन उसकी सुनिश्चित भौगोलिक स्थिति पर प्रकाश नहीं डालते।
गुप्त काल (319-550 ईसवी) के बाद ही साहित्य में राम को वर्तमान अयोध्या से अभिन्न किया गया।

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