इतिहास में स्त्री

इतिहास में स्त्री-छः
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इतिहास में एक अवधारणा ये है कि बौद्ध धर्म ने तात्कालीन समाज में स्त्रियों की प्रस्थिति को ऊपर उठाया। इस अवधारणा के मूल में गौतम बुद्ध के द्वारा स्त्रियों को बौद्ध संघ में प्रविष्ट होने की अनुमति देना है। इसमें कोई संदेह नहीं की स्त्रियाँ गौतम बुद्ध के काल में ही  बौद्ध संघ का हिस्सा बन गई थी।किन्तु संघ में उनको प्रवेश देने की गौतम की प्रारंभिक  हिचक, स्त्रियों के संघ प्रवेश से सम्बंधित नियम ,संघ में उनके आचरण को लेकर तय की गई पाबंदियां ये बताती हैं कि तत्कालीन समाज की ही भांति बौद्ध धर्म भी अपने प्रारूप में पितृसत्तात्मक सोच से प्रभावित था।यधपि इस प्रभाव के बावजूद अपने प्रारंभिक चरण में बौद्ध धर्म स्त्रियों के प्रति वैदिक धर्म की भांति कट्टरतापूर्वक रवैया नहीं रखता था। यही वजह है कि संघ द्वारा तय किये गए कठोर नियमों के बावजूद काफी बड़ी संख्या में स्त्रियों ने गृहस्थ जीवन को त्याग कर संघ में प्रवेश कर भिक्षुणी बनाना स्वीकार किया। निश्चित रूप से जीवन यापन के विभिन्न उपलब्ध विकल्पों में उन्हें संघ का जीवन बेहतर लगा।

प्रारंभिक बौद्ध धर्म में स्त्री संदर्भो को समझने के लिए थेरीगाथा एक बेहतर स्त्रोत है। अन्य स्रोतों की तुलना में यह इसलिये विशिष्ट है कि इसकी रचना उन्ही स्त्रियों के द्वारा की गई जिनका सामाजिक घटक के रूप में विश्लेषण किया जाना है।अन्यथा इतिहास में स्त्री को तलाशते हुए हमें आम तौर पर पुरुषों द्वारा रचित साहित्य का ही सहारा लेना पड़ता है।थेरीगाथा नारीवाद से अनभिज्ञ ऐतिहासिक चरण का स्त्रीविमर्श प्रस्तुत करने वाला महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।थेरीगाथा में संकलित कविताओं/भजनों में स्त्रियों के सामाजिक-धार्मिक-आध्यात्मिक अनुभव कैद हैं जो मानव की विचार श्रृंखला के इतिहास को और अधिक समृद्ध बनाते हैं। साथ ही  साथ स्त्रियों की दृढ़ इच्छा शक्ति का परिचय भी कराते हैं जिससे वे अपनी भावनात्मक कमजोरियों से ऊपर उठ सकीं और जीवन की उन विषम अप्रीतिकर परिस्थितियों को भुला सकीं जो उनके सतत दुःख का कारण थीं। स्त्रियों ने संघ में प्रवेश से पहले के अपने जीवन के सौभाग्य और दुर्भाग्य का खुलकर  उल्लेख अपनी कविताओं में किया है जो तत्कालीन समाज में उनकी प्रस्थिति को विश्लेषित करने में हमारी मदद करते हैं।थेरीगाथा की रचियता स्त्रियों में ब्राह्मण ,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र सभी वर्णो की स्त्रियां थी जो विभिन्न आर्थिक स्तरों वाले परिवारों से सम्बंधित थी।स्त्रियों के वर्ण-जाति और आर्थिक स्थिति का  बौद्ध संघ की नज़र में कोई महत्व नहीं था।
__________________नीलिमा
#her_story

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