परम्पराएं
परम्पराएं- एक
अनूठा बनारस
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बनारस जिसे हम धर्म की नगरी (Spiritual Capital of India) कहते हैं वहां सदियों से मणिकर्णिका घाट पर नगर वधुओं (वेश्याओं)का नृत्य उत्सव होता आया है।
बहुत से लोग भारत की इस प्राचीन परंपरा से अनभिज्ञ हैं लेकिन ये सच है कि सदियों से बनारस के महाश्मशान घाट पर चैत्र माह में आने वाले नवरात्रों की सप्तमी की रात पैरों में घुंघरू बांधी हुई वेश्याओं का जमावड़ा लगता है। एक तरफ जलती चिता के शोले आसमान में उड़ते हैं तो दूसरी ओर घुंघरू और तबले की आवाज पर नाचती वेश्याएं दिखाई देती हैं।कहा जाता है कि पंद्रहवीं शताब्दी में अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मानसिंह ने काशी के आराध्य देव भगवान शिव के मंदिर की मरम्मत करवाई। इस शुभ अवसर पर राजा मानसिंह बेहतरीन कार्यक्रम का आयोजन करना चाहते थे लेकिन कोई भी कलाकार यहां आने के लिए तैयार नहीं हुआ। शमशान घाट पर होने वाले इस महोत्सव में थिरकने के लिए नगर वधुएं तैयार हो गईं। इस दिन के बाद धीरे-धीरे कर यह परंपरा सी बन गई और तब से लेकर अब तक चैत्र के सातवें नवरात्रि की रात हर साल यहां श्मशान महोत्सव मनाया जाता है।धधकती चिताओं के बीच नृत्य करने के पीछे नगरबधुओं का तर्क होता है कि उन्हें अगले जन्म में इस दुर्गति से मुक्ति मिलेगी। इसी विश्वास से वह प्रत्येक वर्ष यहां आती हैं और अपना नृत्य पेश करती हैं।अब तक इस प्राचीन परंपरा के तहत केवल नगर वधुओं का नृत्य ही होता रहा है लेकिन इस वर्ष से इसमें एक और कड़ी जुड़ने जा रही है। इस दफा पहली बार पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर पद्मश्री ड़ॉ. सोमा घोष अपनी उंगलियां फेरती नजर आएंगी। उनके स्वर पर नगरवधुएं नृत्य करेंगी।
( इस परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ यदि किसी के पास हों तो साझा करें)
अनूठा बनारस
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बनारस जिसे हम धर्म की नगरी (Spiritual Capital of India) कहते हैं वहां सदियों से मणिकर्णिका घाट पर नगर वधुओं (वेश्याओं)का नृत्य उत्सव होता आया है।
बहुत से लोग भारत की इस प्राचीन परंपरा से अनभिज्ञ हैं लेकिन ये सच है कि सदियों से बनारस के महाश्मशान घाट पर चैत्र माह में आने वाले नवरात्रों की सप्तमी की रात पैरों में घुंघरू बांधी हुई वेश्याओं का जमावड़ा लगता है। एक तरफ जलती चिता के शोले आसमान में उड़ते हैं तो दूसरी ओर घुंघरू और तबले की आवाज पर नाचती वेश्याएं दिखाई देती हैं।कहा जाता है कि पंद्रहवीं शताब्दी में अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मानसिंह ने काशी के आराध्य देव भगवान शिव के मंदिर की मरम्मत करवाई। इस शुभ अवसर पर राजा मानसिंह बेहतरीन कार्यक्रम का आयोजन करना चाहते थे लेकिन कोई भी कलाकार यहां आने के लिए तैयार नहीं हुआ। शमशान घाट पर होने वाले इस महोत्सव में थिरकने के लिए नगर वधुएं तैयार हो गईं। इस दिन के बाद धीरे-धीरे कर यह परंपरा सी बन गई और तब से लेकर अब तक चैत्र के सातवें नवरात्रि की रात हर साल यहां श्मशान महोत्सव मनाया जाता है।धधकती चिताओं के बीच नृत्य करने के पीछे नगरबधुओं का तर्क होता है कि उन्हें अगले जन्म में इस दुर्गति से मुक्ति मिलेगी। इसी विश्वास से वह प्रत्येक वर्ष यहां आती हैं और अपना नृत्य पेश करती हैं।अब तक इस प्राचीन परंपरा के तहत केवल नगर वधुओं का नृत्य ही होता रहा है लेकिन इस वर्ष से इसमें एक और कड़ी जुड़ने जा रही है। इस दफा पहली बार पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर पद्मश्री ड़ॉ. सोमा घोष अपनी उंगलियां फेरती नजर आएंगी। उनके स्वर पर नगरवधुएं नृत्य करेंगी।
( इस परंपरा से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ यदि किसी के पास हों तो साझा करें)
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