इतिहास में स्त्री

इतिहास में स्त्री -  12
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इतिहास दर्ज करते समय लगभग पूरी दुनिया के इतिहास से स्त्रियों की इतिहास में भागीदारी को एक सिरे से नकार दिया गया।दुनिया के किसी भी हिस्से का इतिहास पढ़ते समय हम स्त्री को नदारद पाते हैं।अगर कहीं 'वे' हैं भी तो उनकी उपस्थिति आभासी है। सवाल ये है कि प्राकृतिक रूप से पुरुष के साथ सह-अस्तित्व में रही स्त्री कब और कैसे सामाजिक रूप से सहायक की भूमिका में पहुँची    और धीरे-धीरे हाशिये पर पहुँच गई। इसकी पड़ताल के लिए हमें पितृसत्ता के उद्भव और उसके जड़ जमाने की प्रक्रिया को समझना होगा।लिखित इतिहास में स्त्री को स्थान न देने से और उसकी भागीदारी को नकार देने से समाज और संस्कृति के निर्माण और विकास में स्त्री की भूमिका कम नहीं हो जाती।न ही इस भूमिका की  पड़ताल किये बिना स्त्री की मुक्ति संभव है।
पुरुष की भांति स्त्री भी हमेशा से इतिहास का अनिवार्य घटक रही है।भले ही वह हाशिये पर ढ़केल दी गई, इतिहास के निर्माण और विकास में उसकी भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।कदम -कदम पर पुरुष के साथ उसका साझा इतिहास रहा है।संचित स्मृतियाँ, परम्पराएं, आस्था,विश्वास जिनसे हमारी संस्कृति गढ़ी गई है वह पीढ़ी दर पीढ़ी जितना पुरुषों के द्वारा हस्तान्तरित की गई उतनी ही स्त्रियों के द्वारा भी। मौखिक परम्परा ,मिथक ,लोकोक्तियां, मुहावरें, लोक- कला, कर्मकांड  आदि  के निर्माण में दोनों की बराबर की भागीदारी है। इतिहास में स्त्री की भूमिका की
ये पड़ताल एक दीगर सवाल खड़ा करती है कि 'स्त्री ने इतिहास में स्वयं को हाशिये पर ढकेले जानें का पुरजोर विरोध क्यों नहीं किया? क्यों वह पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी संतानों(पुत्र और पुत्री दोनों)में पितृसत्ता के मूल्यों को संचित करती रही और अपने ही विरोध में खड़ी व्यवस्था को बनाये रखने में निरंतर सहयोग करती रही'।लंबे समय तक किसी भी व्यवस्था के सफल अथवा असफल होने के कारण गूढ़ होते हैं।उनका सतही विश्लेषण नहीं किया जा सकता।
_______________नीलिमा
#her_story

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