इतिहास में स्त्री
इतिहास में स्त्री-एक
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इतिहास में स्त्री की सम्मान जनक स्थिति को लेकर हमारे समाज में अनेक भ्रामक धारणाएँ प्रचलित है। इन्ही में से एक मनु स्मृति को स्त्री की सामाजिक दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराती है।इसमें कोई दो राय नहीं है कि मनु का रवैया स्त्री को लेकर कट्टरता की हद तक दुर्भावनापूर्ण है किन्तु मनु स्मृति के समय से पहले और बाद के समाज में भी स्त्री का दर्जा दोयम ही था । वेद-पुराण में स्त्री के सम्मानजनक स्थान की चर्चा बहुधा की जाती रही है।यहाँ हम सिर्फ पुराण पर चर्चा करेंगे।खास बात ये है कि धर्मशास्त्रों की तुलना में पुराणों का स्त्री के प्रति रवैया कम कठोर है। पुराणों की रचना ही समाज के हाशिये पर पड़े सदस्यों, स्त्री एवं शूद्र, के लिए की गई बताई जाती है। जहाँ धर्मशास्त्र स्त्री को वैदिक कर्मकांडों से दूरी बरतने का निर्देश देते हैं वहीं पुराण व्रत-पर्व-तीर्थ में स्त्री की भागीदारी को स्वीकार करते हैं। पौराणिक व्रत-पर्व-तीर्थ के इस विधान ने समाज के ढांचे को प्रभावित किया और धर्म के क्षेत्र में ब्राह्मणों के एकाधिकार को ख़त्म करने की दिशा में पहलकदमी की।पर्व और तीर्थ ने जाति और लिंग के आधार पर बरते जाने वाले सामाजिक भेदभाव को कुछ हद तक कम किया । यही वजह है कि पुराणों का अध्ययन स्त्री और शूद्रों की सामाजिक स्थिति के नए अध्याय खोलता है। पुराणों का समय मनु स्मृति के बाद का है।इसलिए ये कहना की वेद-पुराण के समय स्त्री का सामाजिक दर्जा बेहतर था उसमें गिरावट मनु स्मृति के समय से आई ऐतिहासिक रूप से गलत है। पुराणों का संकलन मनु स्मृति के बाद का है।लैंगिक विभेद पितृसत्तात्मक समाज की विशेषता है। प्राचीन भारतीय समाज भी इससे अछूता नहीं था। विभिन्न ऐतिहासिक कालों का विश्लेषण करते हुए स्त्री पर पुरुष के वर्चस्व की तुलना की जा सकती है किंतु ऐसा काल नहीं तय किया जा सकता जबकि स्त्री इससे अछूती हो।
________________नीलिमा
#her_story
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इतिहास में स्त्री की सम्मान जनक स्थिति को लेकर हमारे समाज में अनेक भ्रामक धारणाएँ प्रचलित है। इन्ही में से एक मनु स्मृति को स्त्री की सामाजिक दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराती है।इसमें कोई दो राय नहीं है कि मनु का रवैया स्त्री को लेकर कट्टरता की हद तक दुर्भावनापूर्ण है किन्तु मनु स्मृति के समय से पहले और बाद के समाज में भी स्त्री का दर्जा दोयम ही था । वेद-पुराण में स्त्री के सम्मानजनक स्थान की चर्चा बहुधा की जाती रही है।यहाँ हम सिर्फ पुराण पर चर्चा करेंगे।खास बात ये है कि धर्मशास्त्रों की तुलना में पुराणों का स्त्री के प्रति रवैया कम कठोर है। पुराणों की रचना ही समाज के हाशिये पर पड़े सदस्यों, स्त्री एवं शूद्र, के लिए की गई बताई जाती है। जहाँ धर्मशास्त्र स्त्री को वैदिक कर्मकांडों से दूरी बरतने का निर्देश देते हैं वहीं पुराण व्रत-पर्व-तीर्थ में स्त्री की भागीदारी को स्वीकार करते हैं। पौराणिक व्रत-पर्व-तीर्थ के इस विधान ने समाज के ढांचे को प्रभावित किया और धर्म के क्षेत्र में ब्राह्मणों के एकाधिकार को ख़त्म करने की दिशा में पहलकदमी की।पर्व और तीर्थ ने जाति और लिंग के आधार पर बरते जाने वाले सामाजिक भेदभाव को कुछ हद तक कम किया । यही वजह है कि पुराणों का अध्ययन स्त्री और शूद्रों की सामाजिक स्थिति के नए अध्याय खोलता है। पुराणों का समय मनु स्मृति के बाद का है।इसलिए ये कहना की वेद-पुराण के समय स्त्री का सामाजिक दर्जा बेहतर था उसमें गिरावट मनु स्मृति के समय से आई ऐतिहासिक रूप से गलत है। पुराणों का संकलन मनु स्मृति के बाद का है।लैंगिक विभेद पितृसत्तात्मक समाज की विशेषता है। प्राचीन भारतीय समाज भी इससे अछूता नहीं था। विभिन्न ऐतिहासिक कालों का विश्लेषण करते हुए स्त्री पर पुरुष के वर्चस्व की तुलना की जा सकती है किंतु ऐसा काल नहीं तय किया जा सकता जबकि स्त्री इससे अछूती हो।
________________नीलिमा
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