इतिहास में स्त्री
इतिहास में स्त्री-सात
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धर्म में स्त्री और स्त्री के धार्मिक सरोकार समाज के लैंगिक संबंधों का विश्लेषण करने का महत्वपूर्ण जरिया हैं।भक्ति आंदोलन और आंदोलन में सक्रिय स्त्रियों का आध्यात्मिक सफर इस तथ्य को स्पष्टता के साथ हमारे सामने रखता है।यह सच है कि आध्यात्म का कोई लिंग नहीं होता किंतु स्त्री और पुरुष का आध्यात्मिक सफर,सफ़र की अड़चनें एक दूसरे से सर्वथा भिन्न होती हैं।लगभग सभी ऐतिहासिक कालों में स्त्री और पुरुष की सामाजिक प्रस्थिति में अंतर रहा है जो धर्म के क्षेत्र में भी दिखाई देता है।भक्ति आंदोलन के अलग-अलग चरणों में सक्रिय चार स्त्रियों के आध्यात्मिक सफर पर नज़र डालने पर हम पाते हैं इन सभी स्त्रियों की भक्ति की अभिव्यक्ति अपने समकालिक पुरुषों से अलग थी।ओवैयार,कराईकल अम्मियर, अंडाल और अक्का महादेवी भक्ति आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।ओवैयार की उपस्थिति संगम काल में स्वीकारी गई है।उसकी लिखी कविताएं 'भक्ति' से संबंधित नहीं हैं।उसकी कविताओं में नैतिकता से परिपूर्ण नीतिपरक शिक्षाएँ दी गई हैं किंतु उनको भक्ति काव्य की संज्ञा नहीं दी जा सकती।उसकी कविताओं में अतियमान नामक शासक की बहुधा प्रशंसा की गई है जिससे प्रतीत होता है कि वह पेशे से चारण कवि थी।तमिल समाज ने एक दरबारी कवि को भक्तिन का दर्जा कियूँ दिया यह अपने आप में विचारणीय है।अपने व्यक्तिगत जीवन में ओवैयार स्त्रियों के लिए तय किए गए परंपरागत कर्तव्यों से कोसो दूर थी।उसने अविवाहित रहना चुना और अपने इस चुनाव के साथ पत्नी और माँ की भूमिकाओं को नकार दिया।किन्तु ऐसा उसने लोकातीत जीवन के अनुभव के लिए नही किया।उसके सरोकार सांसारिक थे।अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसने दरबारी कवि का पेशा चुना।उसकी कविताओं से उसकी सामाजिक संवेदनाये प्रतिविम्बित होती हैं।उससे जुड़े एक मिथक में कहा गया है की उसने अविवाहित रहने के चुनाव के साथ मरुगन देवता से प्रार्थना कर युवावस्था का परित्याग करने की इच्छा व्यक्त की और अपने लिए अविवाहित वृद्ध स्त्री का जीवन चुना। सामाजिक मूल्यों पर तीखा प्रहार उसकी कविताओं में स्पष्ट दिखता है ।जाहिर है कि परंपरागत स्त्री की भूमिका में उसे वह जीवन शैली अकल्पनीय लगी होगी जोवः अपनाना चाहती थी।
पितृ-सत्तात्मक समाज वृद्ध स्त्री को प्रायः जिंस के नजरिए से नहीं देखता।वह सम्मान,श्रद्धा और प्राधिकार की हकदार मानी जाती है।वृद्धा के रूप में ओवैयार की जीवन जीने की अभिलाषा और चुनाव पितृसत्तात्मकसमाज में युवा स्त्री के स्वतंत्र रूप से जीवन जीने के मार्ग में आने वाली दुश्वारियों का परिणाम है।ओवैयार को युवा जीवन की दुश्वारियों से बचने का बेहतर तरीका 'वृद्ध' हो जाना लगा।इस दृष्टिकोण से वृद्धावस्था के चुनाव जा यह मिथक महत्वपूर्ण है। ऐसी ही मिलती जुलती ध्वनियां हमें कराइक्कल, अंडाल और अक्का महादेवी के जीवनवृत से सुनाई देती हैं। इन चारों भक्त स्त्रियों का जीवन चरित दर्शाता है कि इन सभी के आध्यात्म पूर्व जीवन में रूप,यौवन, पुरुष के प्रति समर्पण(परिवार/विवाह) एवं स्त्रियोचित व्यवहार की महत्वपूर्ण भूमिका थी। अध्यात्म के रास्ते की ओर बढ़ते हुए इन सभी स्त्रियों ने सबसे पहले अपने जीवन के इन महत्वपूर्ण कारकों को त्यागा।इन सभी स्त्रियों ने अपने सीमित दायरे में पितृसत्ता से आक्रांत जड़वत समाज को भरपूर चुनौती दी।
________________नीलिमा
#her_story
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धर्म में स्त्री और स्त्री के धार्मिक सरोकार समाज के लैंगिक संबंधों का विश्लेषण करने का महत्वपूर्ण जरिया हैं।भक्ति आंदोलन और आंदोलन में सक्रिय स्त्रियों का आध्यात्मिक सफर इस तथ्य को स्पष्टता के साथ हमारे सामने रखता है।यह सच है कि आध्यात्म का कोई लिंग नहीं होता किंतु स्त्री और पुरुष का आध्यात्मिक सफर,सफ़र की अड़चनें एक दूसरे से सर्वथा भिन्न होती हैं।लगभग सभी ऐतिहासिक कालों में स्त्री और पुरुष की सामाजिक प्रस्थिति में अंतर रहा है जो धर्म के क्षेत्र में भी दिखाई देता है।भक्ति आंदोलन के अलग-अलग चरणों में सक्रिय चार स्त्रियों के आध्यात्मिक सफर पर नज़र डालने पर हम पाते हैं इन सभी स्त्रियों की भक्ति की अभिव्यक्ति अपने समकालिक पुरुषों से अलग थी।ओवैयार,कराईकल अम्मियर, अंडाल और अक्का महादेवी भक्ति आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।ओवैयार की उपस्थिति संगम काल में स्वीकारी गई है।उसकी लिखी कविताएं 'भक्ति' से संबंधित नहीं हैं।उसकी कविताओं में नैतिकता से परिपूर्ण नीतिपरक शिक्षाएँ दी गई हैं किंतु उनको भक्ति काव्य की संज्ञा नहीं दी जा सकती।उसकी कविताओं में अतियमान नामक शासक की बहुधा प्रशंसा की गई है जिससे प्रतीत होता है कि वह पेशे से चारण कवि थी।तमिल समाज ने एक दरबारी कवि को भक्तिन का दर्जा कियूँ दिया यह अपने आप में विचारणीय है।अपने व्यक्तिगत जीवन में ओवैयार स्त्रियों के लिए तय किए गए परंपरागत कर्तव्यों से कोसो दूर थी।उसने अविवाहित रहना चुना और अपने इस चुनाव के साथ पत्नी और माँ की भूमिकाओं को नकार दिया।किन्तु ऐसा उसने लोकातीत जीवन के अनुभव के लिए नही किया।उसके सरोकार सांसारिक थे।अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसने दरबारी कवि का पेशा चुना।उसकी कविताओं से उसकी सामाजिक संवेदनाये प्रतिविम्बित होती हैं।उससे जुड़े एक मिथक में कहा गया है की उसने अविवाहित रहने के चुनाव के साथ मरुगन देवता से प्रार्थना कर युवावस्था का परित्याग करने की इच्छा व्यक्त की और अपने लिए अविवाहित वृद्ध स्त्री का जीवन चुना। सामाजिक मूल्यों पर तीखा प्रहार उसकी कविताओं में स्पष्ट दिखता है ।जाहिर है कि परंपरागत स्त्री की भूमिका में उसे वह जीवन शैली अकल्पनीय लगी होगी जोवः अपनाना चाहती थी।
पितृ-सत्तात्मक समाज वृद्ध स्त्री को प्रायः जिंस के नजरिए से नहीं देखता।वह सम्मान,श्रद्धा और प्राधिकार की हकदार मानी जाती है।वृद्धा के रूप में ओवैयार की जीवन जीने की अभिलाषा और चुनाव पितृसत्तात्मकसमाज में युवा स्त्री के स्वतंत्र रूप से जीवन जीने के मार्ग में आने वाली दुश्वारियों का परिणाम है।ओवैयार को युवा जीवन की दुश्वारियों से बचने का बेहतर तरीका 'वृद्ध' हो जाना लगा।इस दृष्टिकोण से वृद्धावस्था के चुनाव जा यह मिथक महत्वपूर्ण है। ऐसी ही मिलती जुलती ध्वनियां हमें कराइक्कल, अंडाल और अक्का महादेवी के जीवनवृत से सुनाई देती हैं। इन चारों भक्त स्त्रियों का जीवन चरित दर्शाता है कि इन सभी के आध्यात्म पूर्व जीवन में रूप,यौवन, पुरुष के प्रति समर्पण(परिवार/विवाह) एवं स्त्रियोचित व्यवहार की महत्वपूर्ण भूमिका थी। अध्यात्म के रास्ते की ओर बढ़ते हुए इन सभी स्त्रियों ने सबसे पहले अपने जीवन के इन महत्वपूर्ण कारकों को त्यागा।इन सभी स्त्रियों ने अपने सीमित दायरे में पितृसत्ता से आक्रांत जड़वत समाज को भरपूर चुनौती दी।
________________नीलिमा
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