इतिहास में स्त्री

इतिहास में स्त्री-दो
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ऋग्वेद में कुछ श्लोक ऐसे हैं जिनकी रचना ऋषिकाओं के द्वारा की गई है। कुल 16 ऋषिकाओं के नाम हमें ऋग्वेद से मिलते हैं। रोमशा,लोप मुद्रा,विश्ववारा अत्रेयी,अपाला,यमी, घोषा, सूर्या,उर्वशी आदि। इन ऋषिकाओं का हवाला देते हुए यह बार-बार स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि वैदिक कालीन भारत में स्त्री का सम्माननीय स्थान था।वे सुसंस्कृत एवं सुशिक्षित थी। उन्हें समाज में बराबरी का दर्ज़ा मिला हुआ था। सर्वाधिक चर्चित नाम रोमशा,घोषा, अपाला और लोपा मुद्रा के हैं।इन स्त्रियों की चर्चा उनके मंत्र रच लेने की सामर्थ्य की वजह से की जाती है ।ऋचाओं का विश्लेषण करने पर हम ये पाते हैं कि इन स्त्रियों की अधिक महत्वपूर्ण विशेषता इनकी स्वाग्रही प्रवृत्ति और यौनिकता की मुखर अविव्यक्ति है जो उन्हें अनुगामिनी स्त्री के खाँचे से बाहर एक स्वतंत्र,सहज स्त्री की पहचान देती है। गौरतलब बात ये है कि इन स्त्रियों की ऋचाओं की विषय वस्तु पर प्रायः चर्चा नहीं मिलती है। सवाल ये है कि क्या हमारा पितृसत्तात्मक समाज मंत्र/श्लोक/ऋचा रच लेने की योग्यता का महिमामंडन करने के साथ-साथ इन स्त्रियों की ऋचाओं की विषय वस्तु से भी इत्तेफाक रखता है?ऋग्वैदिक स्त्री को उसकी स्वतंत्र यौनाभिव्यक्ति की सहमति देता है,उसे सहजता से लेता है?ऋग्वेद की विषय वस्तु ऐसी कोई दावेदारी प्रस्तुत नही करती जिससे माना जाए कि स्त्री की स्वतंत्र-स्वाग्रही प्रकृति ऋग्वैदिक काल में प्रशंसनीय थी। ऋग्वेद में विभिन्न स्थितियों,परिस्थितियों में जीवन निर्वाह करने वाली स्त्रियां मिलती हैं।पर उन सभी की सामाजिक प्रस्थिति एक जैसी है।समाज में उनका दर्जा दोयम है।

_______ नीलिमा

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