इतिहास में स्त्री
#राम कथा और हम - (पोस्ट संख्या -01)*
----------------------------------------------
पतिव्रता के आदर्श को रचने में और उसे समाज में स्थापित क रने में मिथकों की उल्लेखनीय भूमिका रही है।धर्मशास्त्रों में जो बातें खरी-खरी पूरी कड़वाहट के साथ कही गईं उनका क्रियान्वयन मिथकों के माध्यम से महीन तरीके से किया गया। हमारे दोनों महाकाव्य अनेकानेक मिथकों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। सामाजिक आदर्श को रचने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। अपने आचार-विचार-व्यवहार से हमारा समाज सामन्ती है।सामन्ती समाज स्त्री को जंगली पशु की भांति बेलगाम स्वभाव का समझता है जिसे सभ्य- सुशील और सामाजिक रूप से ग्राह्य बनाने के लिए 'पतिव्रता' के आदर्श को गढ़ा गया।इस आदर्श को समाज में व्यवस्थित और रूढ़ करने में रामायण ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।महाभारत के बाद रचा गया ये महाकाव्य अन्य सभी भारतीय महाकाव्यों से इस मायने में अलग है कि ये पहली बार समाज/परिवार के सदस्यों की आदर्श भूमिका को निर्धारित करने में सफल रहा।राम जैसा आदर्श पुत्र,भरत जैसा आदर्श भाई और सीता जैसी आदर्श पत्नी वाल्मीकि रामायण से पहले नही मिलते हैं।इन तीनों में से भारतीय जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी सीता के मिथक ने।भारतीय समाज को जिस तरह इस मिथक ने लुभाया वह अकल्पनीय है। तरह-तरह की तकलीफों से सराबोर सीता का चरित्र पहाड़ जैसे धैर्य का परिचय देता है।निरंतर कष्ट सहती,पतिव्रता,धैर्यवान पत्नी की जो मिसाल सीता ने कायम वह जनमानस में रूढ़ हो गई।आज भी हमारे समाज का पुरुष अपनी स्त्री में सीता की छवि तलाश रहा है।रामायण ने हमारी संस्कृति के विभिन्न आयामों को प्रभावित किया है।भारत का कोई भौगोलिक हिस्सा ऐसा नहीं है जिसकी अपनी रामकथा न हो।हर बरस हम रामलीला खेलते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि हम राम कथा को,आदर्श पतिव्रता सीता को आज भी नहीं भूलें है। सीता का आदर्श अत्यधिक मजबूत और दीर्घजीवी साबित हुआ।
______________नीलिमा
(इतिहास में स्त्री - नौ)*
#her_story
----------------------------------------------
पतिव्रता के आदर्श को रचने में और उसे समाज में स्थापित क रने में मिथकों की उल्लेखनीय भूमिका रही है।धर्मशास्त्रों में जो बातें खरी-खरी पूरी कड़वाहट के साथ कही गईं उनका क्रियान्वयन मिथकों के माध्यम से महीन तरीके से किया गया। हमारे दोनों महाकाव्य अनेकानेक मिथकों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। सामाजिक आदर्श को रचने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। अपने आचार-विचार-व्यवहार से हमारा समाज सामन्ती है।सामन्ती समाज स्त्री को जंगली पशु की भांति बेलगाम स्वभाव का समझता है जिसे सभ्य- सुशील और सामाजिक रूप से ग्राह्य बनाने के लिए 'पतिव्रता' के आदर्श को गढ़ा गया।इस आदर्श को समाज में व्यवस्थित और रूढ़ करने में रामायण ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।महाभारत के बाद रचा गया ये महाकाव्य अन्य सभी भारतीय महाकाव्यों से इस मायने में अलग है कि ये पहली बार समाज/परिवार के सदस्यों की आदर्श भूमिका को निर्धारित करने में सफल रहा।राम जैसा आदर्श पुत्र,भरत जैसा आदर्श भाई और सीता जैसी आदर्श पत्नी वाल्मीकि रामायण से पहले नही मिलते हैं।इन तीनों में से भारतीय जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी सीता के मिथक ने।भारतीय समाज को जिस तरह इस मिथक ने लुभाया वह अकल्पनीय है। तरह-तरह की तकलीफों से सराबोर सीता का चरित्र पहाड़ जैसे धैर्य का परिचय देता है।निरंतर कष्ट सहती,पतिव्रता,धैर्यवान पत्नी की जो मिसाल सीता ने कायम वह जनमानस में रूढ़ हो गई।आज भी हमारे समाज का पुरुष अपनी स्त्री में सीता की छवि तलाश रहा है।रामायण ने हमारी संस्कृति के विभिन्न आयामों को प्रभावित किया है।भारत का कोई भौगोलिक हिस्सा ऐसा नहीं है जिसकी अपनी रामकथा न हो।हर बरस हम रामलीला खेलते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि हम राम कथा को,आदर्श पतिव्रता सीता को आज भी नहीं भूलें है। सीता का आदर्श अत्यधिक मजबूत और दीर्घजीवी साबित हुआ।
______________नीलिमा
(इतिहास में स्त्री - नौ)*
#her_story
Comments
Post a Comment