पवित्र गाय
पवित्र गाय-02
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गोमांस - भक्षण को धीरे धीरे पाप और अशुद्धता का स्त्रोत मनाने का सिलसिला पूर्व मध्य काल (800-1200ईसवी सम्वत) में आरंभ हुआ।गाय और उसके उत्पादों(दूध,घी,दही,गोबर और मूत्र), जिसे सामूहिक रूप से साहित्य में पंचगव्य कहा गया है,के मिश्रण से शुद्धिकरण का प्रारंभ पूर्व मध्य काल से काफी पहले हो गया था।पंचगव्य शब्द का प्रयोग पहली बार बौधायन धर्मसूत्र में मिलता है।मनु,विष्णु,वशिष्ठ,याज्ञवल्क आदि ने शुद्दीकरण तथा प्रयाश्चित के लिए पंचगव्य के उपयोग का उल्लेख किया गया। दिलचस्प बात ये है की चरक,सुश्रुत,वाग्भट्ट की आयुर्वेदिक रचनाओं में भी पंचगव्य के औषधि के रूप में उपयोग के संदर्भ हैं।अंतर्भूत मान्यता यह थी कि पंचगव्य शुद्ध है।शुद्धता के इस महिमामंडन के विपरीत अनेक धर्मशास्त्रीय रचनाओं में स्त्रियों तथा निम्न जातियों के लिए इसके उपयोग का निषेध किया गया है और कहा गयाहै कि पंचगव्य पीने वाला नरक जाता है।दूसरा विरोधाभासी तथ्य गाय के मुख के शुद्दीकरण को लेकर मिलता है। जिस गाय का पंचगव्य शुद्धिकारक माना गया है उसी के सूंघे हुए भोजन को अशुद्ध बताया गया है। मनु, विष्णु तथा याज्ञवल्क का मानना है कि गाय के सूंघे भोजन को शुद्ध करना आवश्यक है।याज्ञवल्क ने तो यहाँ तक कहा है की घोड़े और बकरे का मुंह शुद्ध होता है लेकिन गाय का नहीं। स्मृतिकार शंख ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मुँह को छोड़कर गाय के अन्य सभी अंग शुद्ध हैं। ये संदर्भ गाय की पवित्रता की अवधारणा के खिलाफ जाता है।गाय की पावनता इसलिए भी संदिग्ध है कि इतने दीर्घकालिक इतिहास में गाय को देवी के रूप में न तो रूपांतरित किया गया न ही उसकी प्रतिष्ठा में मंदिर बनाने की परंपरा विकसित हुई।
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गोमांस - भक्षण को धीरे धीरे पाप और अशुद्धता का स्त्रोत मनाने का सिलसिला पूर्व मध्य काल (800-1200ईसवी सम्वत) में आरंभ हुआ।गाय और उसके उत्पादों(दूध,घी,दही,गोबर और मूत्र), जिसे सामूहिक रूप से साहित्य में पंचगव्य कहा गया है,के मिश्रण से शुद्धिकरण का प्रारंभ पूर्व मध्य काल से काफी पहले हो गया था।पंचगव्य शब्द का प्रयोग पहली बार बौधायन धर्मसूत्र में मिलता है।मनु,विष्णु,वशिष्ठ,याज्ञवल्क आदि ने शुद्दीकरण तथा प्रयाश्चित के लिए पंचगव्य के उपयोग का उल्लेख किया गया। दिलचस्प बात ये है की चरक,सुश्रुत,वाग्भट्ट की आयुर्वेदिक रचनाओं में भी पंचगव्य के औषधि के रूप में उपयोग के संदर्भ हैं।अंतर्भूत मान्यता यह थी कि पंचगव्य शुद्ध है।शुद्धता के इस महिमामंडन के विपरीत अनेक धर्मशास्त्रीय रचनाओं में स्त्रियों तथा निम्न जातियों के लिए इसके उपयोग का निषेध किया गया है और कहा गयाहै कि पंचगव्य पीने वाला नरक जाता है।दूसरा विरोधाभासी तथ्य गाय के मुख के शुद्दीकरण को लेकर मिलता है। जिस गाय का पंचगव्य शुद्धिकारक माना गया है उसी के सूंघे हुए भोजन को अशुद्ध बताया गया है। मनु, विष्णु तथा याज्ञवल्क का मानना है कि गाय के सूंघे भोजन को शुद्ध करना आवश्यक है।याज्ञवल्क ने तो यहाँ तक कहा है की घोड़े और बकरे का मुंह शुद्ध होता है लेकिन गाय का नहीं। स्मृतिकार शंख ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मुँह को छोड़कर गाय के अन्य सभी अंग शुद्ध हैं। ये संदर्भ गाय की पवित्रता की अवधारणा के खिलाफ जाता है।गाय की पावनता इसलिए भी संदिग्ध है कि इतने दीर्घकालिक इतिहास में गाय को देवी के रूप में न तो रूपांतरित किया गया न ही उसकी प्रतिष्ठा में मंदिर बनाने की परंपरा विकसित हुई।
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