प्रतिरोध के स्वर
#प्रतिरोध के स्वर-04
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महाभारत की मूल कथा आदि पर्व में सत्यवती के प्रवेश के साथ प्रारंभ होती है। कथा में संकेत है कि सत्यवती उपरिकर वासु नामक राजा की पुत्री है । वासु को पुत्री संतान स्वकार्य न थी। इसलिए उसने सत्यवती को मछुवारों के बीच छोड़ दिया। यह लिंग के आधार पर संतान के अस्वीकार के प्राचीनतम उदाहरणों में से है।पिता द्वारा अस्वीकृत सत्यवती का पालन-पोषण मछुवारों के बीच हुआ। वयस्क होने पर अपने सौंदर्य से अभिभूत दोनों पुरुषों से सत्यवती ने सशर्त संबंध स्थापित किया।पराशर मुनि से उसने वरदान में आर्य स्त्री जैसा आचरण,व्यवहार,संस्कार,ज्ञान मांग कर न केवल अपने व्यक्तित्व का परिष्कार किया बल्कि अपने शरीर की मछली जैसी दुर्गंध से भी मुक्ति पाई। वहीं शांतनु से उसने विवाह की शर्त नें अपने पुत्र के लिए राज्य का उत्तराधिकार मांगा।यद्दपि यह शर्त उसके पालक पिता निषाद-राज के द्वारा सुझाई गई थी,सत्यवती ने इसके प्रति किसी किस्म का विरोध दर्ज नहीं किया। सत्यवती का व्यक्तित्व अपने आत्म के प्रति सचेतन स्त्री का है। पराशर मुनि के साथ अपने विवाह पूर्व अन्यगमन और उससे उत्पन्न संतान को लेकर उसके व्यक्तित्व में कोई झिझक नहीं है। वह सार्वजनिक रूप से न केवल अपने 'कनिन पुत्र' को न केवल स्वीकार करती है बल्कि विचित्रवीर्य की संतानहीन युवा विधवाओं अम्बिका और अम्बालिका से नियोग के द्वारा क्षेत्रज संतान उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व भी कृष्ण द्वैपायन व्यास को सौंपती है। सत्यवती का यह निर्णय दो बातों की तरफ हमारा ध्यानाकर्षित करता है।पहला,अपने इस निर्णय से वह धर्मशास्त्रीय निदर्श का उल्लंघन करती है। सारे महत्वपूर्ण निर्णय लेने और उनके निष्पादन का कार्य परिवार के पुरुषों के स्थान पर सत्यवती के द्वारा होता है, जो पितृसत्ता के मानकों के अनुरूप नहीं है। दूसरा,धर्मशास्त्रों में नियोग के लिए पति के भाई का नाम सुझाया गया है।भाई की अनुपस्थिति में कोई सपिंड-सगोत्र रिश्तेदार इस कार्य को सम्पन्न कर सकता है। व्यास इस परिभाषा में फिट नहीं बैठते । सत्यवती के निर्णय एवं आचरण पितृ-सत्तात्मक सामाजिक प्रतिमानों का उत्क्रमण हैं जो उसे स्वतंत्र स्त्री के रूप में स्थापित करते हैं।
___________नीलिमा
( इतिहास में स्त्री-17)
#her_story
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महाभारत की मूल कथा आदि पर्व में सत्यवती के प्रवेश के साथ प्रारंभ होती है। कथा में संकेत है कि सत्यवती उपरिकर वासु नामक राजा की पुत्री है । वासु को पुत्री संतान स्वकार्य न थी। इसलिए उसने सत्यवती को मछुवारों के बीच छोड़ दिया। यह लिंग के आधार पर संतान के अस्वीकार के प्राचीनतम उदाहरणों में से है।पिता द्वारा अस्वीकृत सत्यवती का पालन-पोषण मछुवारों के बीच हुआ। वयस्क होने पर अपने सौंदर्य से अभिभूत दोनों पुरुषों से सत्यवती ने सशर्त संबंध स्थापित किया।पराशर मुनि से उसने वरदान में आर्य स्त्री जैसा आचरण,व्यवहार,संस्कार,ज्ञान मांग कर न केवल अपने व्यक्तित्व का परिष्कार किया बल्कि अपने शरीर की मछली जैसी दुर्गंध से भी मुक्ति पाई। वहीं शांतनु से उसने विवाह की शर्त नें अपने पुत्र के लिए राज्य का उत्तराधिकार मांगा।यद्दपि यह शर्त उसके पालक पिता निषाद-राज के द्वारा सुझाई गई थी,सत्यवती ने इसके प्रति किसी किस्म का विरोध दर्ज नहीं किया। सत्यवती का व्यक्तित्व अपने आत्म के प्रति सचेतन स्त्री का है। पराशर मुनि के साथ अपने विवाह पूर्व अन्यगमन और उससे उत्पन्न संतान को लेकर उसके व्यक्तित्व में कोई झिझक नहीं है। वह सार्वजनिक रूप से न केवल अपने 'कनिन पुत्र' को न केवल स्वीकार करती है बल्कि विचित्रवीर्य की संतानहीन युवा विधवाओं अम्बिका और अम्बालिका से नियोग के द्वारा क्षेत्रज संतान उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व भी कृष्ण द्वैपायन व्यास को सौंपती है। सत्यवती का यह निर्णय दो बातों की तरफ हमारा ध्यानाकर्षित करता है।पहला,अपने इस निर्णय से वह धर्मशास्त्रीय निदर्श का उल्लंघन करती है। सारे महत्वपूर्ण निर्णय लेने और उनके निष्पादन का कार्य परिवार के पुरुषों के स्थान पर सत्यवती के द्वारा होता है, जो पितृसत्ता के मानकों के अनुरूप नहीं है। दूसरा,धर्मशास्त्रों में नियोग के लिए पति के भाई का नाम सुझाया गया है।भाई की अनुपस्थिति में कोई सपिंड-सगोत्र रिश्तेदार इस कार्य को सम्पन्न कर सकता है। व्यास इस परिभाषा में फिट नहीं बैठते । सत्यवती के निर्णय एवं आचरण पितृ-सत्तात्मक सामाजिक प्रतिमानों का उत्क्रमण हैं जो उसे स्वतंत्र स्त्री के रूप में स्थापित करते हैं।
___________नीलिमा
( इतिहास में स्त्री-17)
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