इतिहास में स्त्री
राम कथा और हम (पोस्ट संख्या-02)*
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राम की समर्पित पत्नी के रूप में सीता ने आदर्श पत्नी का जो प्रतिमान प्रस्तुत किया है,वह बेजोड़ है।इस चरित्र ने धर्मशास्त्रीय निदर्श में प्रस्तुत आदर्श पत्नी की परिकल्पना को जीवंत कर दिया और भारतीय समाज के समक्ष स्त्री/पत्नी सुलभ आचरण का मानक प्रस्तुत किया। पतिव्रता सीता की इस लोकप्रियता ने उसे लोक संपदा का अभिन्न अंग बना दिया।भारत के हर कोने से हमें सीता के आख्यान पर आधारित लोकगीत मिलते हैं।
भोजपुरी और अवधी लोकगीत सीता की जो तस्वीर खींचते हैं वह रामायण की सीता से विरोधाभास रखती है। वाल्मीकि की सीता यदा-कदा बहुत कम बोलती हैं। यही स्थिति रामायण की अन्य स्त्रियों की है। स्त्रियों का यह व्यवहार पितृवंशीय-पितृसत्तात्मक समाज के अनुकूल है।वाल्मीकि रामायण की तुलना में भोजपुरी-अवधी लोकगीतों की सीता अधिक मुखर और आग्रही हैं।वह अधिक मानवीय, जीवंत और सक्रिय हैं;वह हाड़-मांस की एक अधिक वास्तविक स्त्री की छवि प्रस्तुत करती हैं,जो रामायण में अनुपस्थित है।
वाल्मीकि रामायण में पहली बार हम सीता से जनक की पुत्री के रूप में परोक्ष रूप से मिलते हैं।यहाँ सीता एक सुंदर- शीलवान कन्या के रूप में सामने आती हैं जो स्वयं के विवाह,उससे जुड़ी प्रतिज्ञा आदि पर अपने पालक पिता जनक से कोई प्रश्न नहीं करती हैं।ऐसा करना स्त्रियोचित व्यवहार की अपेक्षित शालीनता और मर्यादा के अनुरूप है।लोकगीतों में भी सीता के के विवाह के संदर्भ हैं।वाल्मीकि के विपरीत इन गीतों में सीता एक ऐसी नवयुवती के रूप में चित्रित हैं जो अपने दूल्हे को लेकर उत्सुक है। विवाह से जुड़ी इच्छाएँ और अपेक्षाएं कभी उसे उल्लास से भरती हैं तो कभी निराश करती हैं।लोकगीतों में सीता की जो भंगिमा और व्यवहार दर्शाया गया है वह सीता की परंपरागत छवि के प्रतिकूल है।
सीता के आख्यान में स्वयंवर के अलावा उनका रावण के द्वारा अपहरण और अग्नि-परीक्षा सर्वाधिक चर्चित प्रसंग हैं। लोकगीतों में सीता के हरण की चर्चा लगभग अनुपस्थिति है।ऐसा प्रासंगिक भी है। अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में स्त्रियां इस प्रसंग से कोई सहसंबंध स्थापित नही कर पातीं।इसलिए इस विषय पर न तो उन्होनें गीत गढ़े न ही उन्हें गाती हैं।
सीता के निष्कासन और अग्नि-परीक्षा का प्रसंग स्त्रियों को सर्वाधिक आतंकित करता है।इसकी अभिव्यक्ति अनेकानेक लोकगीतों में मिलती है।स्त्रियां सीता को परित्यक्त करने के अपराध में राम को लगभग अस्वीकार कर देती हैं।राम के इस कृत्य के लिए उनके मन में कड़वाहट है।वे उन्हें पापी और निष्ठुर कह कर संबोधित करती हैं और उनके इस निर्णय को अनैतिक बताती हैं। धरती माता की गोद में लौट जाने का रूपक इन्ही गीतों में इस्तेमाल किया गया है।
अवधी का एक गीत कहता है-
'राम निर्मोहिया कै मुँहवा जियत नाही देखबै हो'
दूसरे में ये उद्गार हैं-
फाटहु धरती!हो फाटहु धरती, धरती गयब होई जाऊं,
ऐसे पुरुखवा कै मुँहवा न देखौं, गरभै दिहिस बनवास'
धरती में समा जानें का रूपक स्त्रियों के दुनियावी और व्यवहारिक अनुभवों को रेखांकित करता है।हमारे समाज में स्त्री के चरित्र पर लगा दाग उसकी मृत्यु के साथ ही मिटता है।स्त्री को समाज के द्वारा तय की गई विभिन्न कसौटियों पर खरा उतरकर अपने चरित्र का प्रमाण देना होता है।चरित्रहीन स्त्री पितृसत्तामक समाज के लिए चुनौती मानी जाती है। पुरुष की प्रधानता को प्रमाणित करने के लिए यह जरूरी है कि ऐसी स्त्री को विभिन्न कसौटियों के माध्यम से नियंत्रित किया जाए।
इन लोकगीतों के माध्यम से स्त्रियां अपना प्रतिरोध दर्ज कराती हैं। अफ़सोस इस बात का है कि उनका ये प्रतिरोध पितृसत्ता की चौहद्दी से टकराकर लौट आता है।लगभग सभी गीतों में पति(राम)के द्वारा नकार दी गई पत्नी(सीता) अपने जीवन को समाप्त कर देने की इच्छा जताती है अथवा ऐसा कर गुजरती है।किसी भी गीत में लांछित स्त्री (सीता) पति(राम) को चुनौती दे स्वतंत्र और आत्म-निर्भर जीवन की तरफ कदम बढ़ाती नहीं दिखती।
इन गीतों में सीता हर उस स्त्री का प्रतीक है जो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में तमाम दिक्कतों परेशानियों दुखों से रूबरू होती है।विवाह के बाद उसकी उम्मीद और हौसले का एकमात्र सहारा उसका पति होता है।ऐसी स्थिति में यदि वह किसी कारण-अकारण अपने पति की नजरों से गिर गई तो उसके पास खोने को कुछ नहीं बचता है।हमारा समाज स्त्री को प्यार,दुलार,सुरक्षा, प्रतिष्ठा,परिवार का सुख वैवाहिक संबंध और पति के माध्यम से प्रदान करता है।स्त्री की पहचान उसके पति से मानी जाती है।इसलिए यदि कोई स्त्री सार्वजनिक रूप से अपने पति को शर्मिंदा करती है तो यह जरूरी हो जाता है कि वो प्रयाश्चित करे।समाज के पास ऐसे अनगिनत कारण हैं जो स्त्री के द्वारा प्रयाश्चित और अफसोस करने की वजह बनते हैं।लगातार कठघरे में खड़ी की जाती स्त्रियों में ये भाव घर कर गया है कि कहीं वे परिवार और पति के अपमान का कारण न बन जाएं।इस भाव ने उनके व्यक्तित्व की सहजता को समाप्त कर दिया है।यही वजह है कि स्त्रियाँ सीता के मिथक से अभिन्नता महसूस करती हैं।खुद में सीता,सीता में खुद को ढूढ़ती हुई स्त्रियां निरंतर सीता से अपनी तुलना करती हैं और सीता के हश्र में अपना हश्र देखती हैं।सीता का रूपक उन्हें आत्मबल देता है,इसी वजह से वे सीता की कथा को गुनती-बुनती रहती हैं और अपने दुःखो को पीती रहती हैं।गीतों के माध्यम से उनका यह प्रतिरोध आंतरिक है।
_______________नीलिमा
( इतिहास में स्त्री- दस)*
#her_story
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राम की समर्पित पत्नी के रूप में सीता ने आदर्श पत्नी का जो प्रतिमान प्रस्तुत किया है,वह बेजोड़ है।इस चरित्र ने धर्मशास्त्रीय निदर्श में प्रस्तुत आदर्श पत्नी की परिकल्पना को जीवंत कर दिया और भारतीय समाज के समक्ष स्त्री/पत्नी सुलभ आचरण का मानक प्रस्तुत किया। पतिव्रता सीता की इस लोकप्रियता ने उसे लोक संपदा का अभिन्न अंग बना दिया।भारत के हर कोने से हमें सीता के आख्यान पर आधारित लोकगीत मिलते हैं।
भोजपुरी और अवधी लोकगीत सीता की जो तस्वीर खींचते हैं वह रामायण की सीता से विरोधाभास रखती है। वाल्मीकि की सीता यदा-कदा बहुत कम बोलती हैं। यही स्थिति रामायण की अन्य स्त्रियों की है। स्त्रियों का यह व्यवहार पितृवंशीय-पितृसत्तात्मक समाज के अनुकूल है।वाल्मीकि रामायण की तुलना में भोजपुरी-अवधी लोकगीतों की सीता अधिक मुखर और आग्रही हैं।वह अधिक मानवीय, जीवंत और सक्रिय हैं;वह हाड़-मांस की एक अधिक वास्तविक स्त्री की छवि प्रस्तुत करती हैं,जो रामायण में अनुपस्थित है।
वाल्मीकि रामायण में पहली बार हम सीता से जनक की पुत्री के रूप में परोक्ष रूप से मिलते हैं।यहाँ सीता एक सुंदर- शीलवान कन्या के रूप में सामने आती हैं जो स्वयं के विवाह,उससे जुड़ी प्रतिज्ञा आदि पर अपने पालक पिता जनक से कोई प्रश्न नहीं करती हैं।ऐसा करना स्त्रियोचित व्यवहार की अपेक्षित शालीनता और मर्यादा के अनुरूप है।लोकगीतों में भी सीता के के विवाह के संदर्भ हैं।वाल्मीकि के विपरीत इन गीतों में सीता एक ऐसी नवयुवती के रूप में चित्रित हैं जो अपने दूल्हे को लेकर उत्सुक है। विवाह से जुड़ी इच्छाएँ और अपेक्षाएं कभी उसे उल्लास से भरती हैं तो कभी निराश करती हैं।लोकगीतों में सीता की जो भंगिमा और व्यवहार दर्शाया गया है वह सीता की परंपरागत छवि के प्रतिकूल है।
सीता के आख्यान में स्वयंवर के अलावा उनका रावण के द्वारा अपहरण और अग्नि-परीक्षा सर्वाधिक चर्चित प्रसंग हैं। लोकगीतों में सीता के हरण की चर्चा लगभग अनुपस्थिति है।ऐसा प्रासंगिक भी है। अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में स्त्रियां इस प्रसंग से कोई सहसंबंध स्थापित नही कर पातीं।इसलिए इस विषय पर न तो उन्होनें गीत गढ़े न ही उन्हें गाती हैं।
सीता के निष्कासन और अग्नि-परीक्षा का प्रसंग स्त्रियों को सर्वाधिक आतंकित करता है।इसकी अभिव्यक्ति अनेकानेक लोकगीतों में मिलती है।स्त्रियां सीता को परित्यक्त करने के अपराध में राम को लगभग अस्वीकार कर देती हैं।राम के इस कृत्य के लिए उनके मन में कड़वाहट है।वे उन्हें पापी और निष्ठुर कह कर संबोधित करती हैं और उनके इस निर्णय को अनैतिक बताती हैं। धरती माता की गोद में लौट जाने का रूपक इन्ही गीतों में इस्तेमाल किया गया है।
अवधी का एक गीत कहता है-
'राम निर्मोहिया कै मुँहवा जियत नाही देखबै हो'
दूसरे में ये उद्गार हैं-
फाटहु धरती!हो फाटहु धरती, धरती गयब होई जाऊं,
ऐसे पुरुखवा कै मुँहवा न देखौं, गरभै दिहिस बनवास'
धरती में समा जानें का रूपक स्त्रियों के दुनियावी और व्यवहारिक अनुभवों को रेखांकित करता है।हमारे समाज में स्त्री के चरित्र पर लगा दाग उसकी मृत्यु के साथ ही मिटता है।स्त्री को समाज के द्वारा तय की गई विभिन्न कसौटियों पर खरा उतरकर अपने चरित्र का प्रमाण देना होता है।चरित्रहीन स्त्री पितृसत्तामक समाज के लिए चुनौती मानी जाती है। पुरुष की प्रधानता को प्रमाणित करने के लिए यह जरूरी है कि ऐसी स्त्री को विभिन्न कसौटियों के माध्यम से नियंत्रित किया जाए।
इन लोकगीतों के माध्यम से स्त्रियां अपना प्रतिरोध दर्ज कराती हैं। अफ़सोस इस बात का है कि उनका ये प्रतिरोध पितृसत्ता की चौहद्दी से टकराकर लौट आता है।लगभग सभी गीतों में पति(राम)के द्वारा नकार दी गई पत्नी(सीता) अपने जीवन को समाप्त कर देने की इच्छा जताती है अथवा ऐसा कर गुजरती है।किसी भी गीत में लांछित स्त्री (सीता) पति(राम) को चुनौती दे स्वतंत्र और आत्म-निर्भर जीवन की तरफ कदम बढ़ाती नहीं दिखती।
इन गीतों में सीता हर उस स्त्री का प्रतीक है जो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में तमाम दिक्कतों परेशानियों दुखों से रूबरू होती है।विवाह के बाद उसकी उम्मीद और हौसले का एकमात्र सहारा उसका पति होता है।ऐसी स्थिति में यदि वह किसी कारण-अकारण अपने पति की नजरों से गिर गई तो उसके पास खोने को कुछ नहीं बचता है।हमारा समाज स्त्री को प्यार,दुलार,सुरक्षा, प्रतिष्ठा,परिवार का सुख वैवाहिक संबंध और पति के माध्यम से प्रदान करता है।स्त्री की पहचान उसके पति से मानी जाती है।इसलिए यदि कोई स्त्री सार्वजनिक रूप से अपने पति को शर्मिंदा करती है तो यह जरूरी हो जाता है कि वो प्रयाश्चित करे।समाज के पास ऐसे अनगिनत कारण हैं जो स्त्री के द्वारा प्रयाश्चित और अफसोस करने की वजह बनते हैं।लगातार कठघरे में खड़ी की जाती स्त्रियों में ये भाव घर कर गया है कि कहीं वे परिवार और पति के अपमान का कारण न बन जाएं।इस भाव ने उनके व्यक्तित्व की सहजता को समाप्त कर दिया है।यही वजह है कि स्त्रियाँ सीता के मिथक से अभिन्नता महसूस करती हैं।खुद में सीता,सीता में खुद को ढूढ़ती हुई स्त्रियां निरंतर सीता से अपनी तुलना करती हैं और सीता के हश्र में अपना हश्र देखती हैं।सीता का रूपक उन्हें आत्मबल देता है,इसी वजह से वे सीता की कथा को गुनती-बुनती रहती हैं और अपने दुःखो को पीती रहती हैं।गीतों के माध्यम से उनका यह प्रतिरोध आंतरिक है।
_______________नीलिमा
( इतिहास में स्त्री- दस)*
#her_story
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