मैथिली के लोक संदर्भ
रामनवमी से जुड़े मैथिली लोक के संदर्भ
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एक बार राम को मिथिला के लोगों की नज़र से देखें तो सही! लगेगा हम भी मिथिला में क्यों न हुए।
हम मिथिला के लोग हैं। हम श्रीराम को नहीं पूजते। उनके प्रति हमारा सम्मान भाव तो है, लेकिन इधर हाल तक हम श्रीराम की पूजा नहीं करते थे। नये लोगों ने अब ये चलन बदल दिया है।
हम राम की पूजा इसलिए नहीं करते थे... कि कोशल के राजकुमार राम ने विदेह की हमारी राजकुमारी वैदेही को बहुत प्रताड़ित किया। बहुत तकलीफ दी। उनकी अग्नि परीक्षा ली। धोबी के कहने पर हमारी गर्भवती जनकनंदनी को वन में छोड़ दिया। एक लालची औरत के काबू में आए अपने पिता की मान की रक्षा के लिए जानकी को जंगल-जंगल भटकाया।
जानकी का तो धर्म (कर्तव्य, दायित्व) था, पति का साथ देना, लेकिन क्या राम का कोई धर्म (उत्तरदायित्व) नहीं था सीता के प्रति? ये सवाल हमें बहुत परेशान करता है? धर्म क्या हमेशा बेटियों के लिए ही होता है?
बेटियों का धर्म तो है, पर उनकी तरफ किसी का, कोई धर्म नहीं? क्यों है ऐसा? ये टीस हमारे मन से निकलती ही नहीं।
राजा जनक ने सीता के लिए वर चुनने की खातिर बहुत कठिन परीक्षा रखी थी, ताकि पूरे आर्यवर्त का सबसे योग्य वर ही सीता को मिले। राम ने उस परीक्षा में अपनी योग्यता साबित कर सीता से विवाह तो कर लिया... लेकिन जिस वजह से जनक ने धनुष की डोर चढ़ाने की वो शर्त रखी थी, उसकी कसौटी पर राम खरे नहीं उतरे। सीता की सुरक्षा, उनकी सुख सुविधा का ध्यान रखने में वो सर्वथा अयोग्य साबित हुए।
इसीलिए मिथिला, अपने पाहुन, कुटुम्ब, दामाद श्री राम से नाखुश रहा किया है। श्री राम ने हमारी सुकुमारी बेटी का ख्याल नहीं रखा।
हम इससे इतने आहत हैं कि हमने सिया को अभागन मान-समझ लिया और अब अपनी किसी बेटी का नाम सीता नहीं रखते। वो इसलिए कि हमें डर लगता है कि सिया नाम रखने से कहीं उसको राम सा पति मिल गया तो?
नहीं, हमारी बेटियों का भाग्य ऐसा नहीं होना चाहिए। वो इतनी बदकिस्मत नहीं हो सकतीं, उन्हें श्री राम सा पति नहीं मिलना चाहिए।
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जब सिया सुकुमारी को दुष्ट रावण हर ले गया तो अवध के राजकुमार ने नहीं, उन्हें किष्किंधा के महावीर हनुमान ने खोजा था...लंका से लेकर उन्हें वही आए।
हनुमान...
बजरंगबली...
पवनसुत...
केसरीनंदन ही वो महावीर थे, जिन्होंने जानकी को सबसे ज्यादा आदर और सम्मान दिया। उनके लिए सदैव तत्पर रहे। सीता की बात हो, तो उन्होंने कोई कायदा नहीं माना, किसी मर्यादा में बंधे नहीं रहे।
तो रामनवमी के दिन... हमारे गांव में बजरंगबली की पूजा होती रही है। पहले हर आंगन के ठीक बीच में एक उंचा ध्वजा गड़ा होता था। सालोंभर फहरानेवाला ये पताका, रामनवमी के दिन ही बदला जाता था। ये हनुमान पताका होता था।
नए बांस में नया हनुमान पताका....
इसे ध्वजा फेरना पुकारते थे। स्थानीय बोली में धाजा फेराय। पहले हनुमान जी की पूजा फिर ध्वजा फेराई... के बाद चीनी के लड्डू प्रसाद में मिलते थे। मिट्टी के छोटे गोल बर्तन, जिसे कंहतरी कहते थे में भरकर चीनी के लड्डू बच्चों और बड़ों में बांटे जाते थे।
अहा क्या स्वाद होता था उनका!
इलाके के हर गांव के ज्यादतर आंगन में, आपको हनुमान ध्वजा फहराता दिख जाता।
बजरंगबली की जय!
शायद इसलिए ही हमारे यहां कुश्ती का जबरदस्त चलन था, मनोरंजन का इकलौता साधन थी कुश्ती और पहलवानी... हनुमान भी तो पहलवान ही थे।
(साभार: अजय कुमार सिंह)
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एक बार राम को मिथिला के लोगों की नज़र से देखें तो सही! लगेगा हम भी मिथिला में क्यों न हुए।
हम मिथिला के लोग हैं। हम श्रीराम को नहीं पूजते। उनके प्रति हमारा सम्मान भाव तो है, लेकिन इधर हाल तक हम श्रीराम की पूजा नहीं करते थे। नये लोगों ने अब ये चलन बदल दिया है।
हम राम की पूजा इसलिए नहीं करते थे... कि कोशल के राजकुमार राम ने विदेह की हमारी राजकुमारी वैदेही को बहुत प्रताड़ित किया। बहुत तकलीफ दी। उनकी अग्नि परीक्षा ली। धोबी के कहने पर हमारी गर्भवती जनकनंदनी को वन में छोड़ दिया। एक लालची औरत के काबू में आए अपने पिता की मान की रक्षा के लिए जानकी को जंगल-जंगल भटकाया।
जानकी का तो धर्म (कर्तव्य, दायित्व) था, पति का साथ देना, लेकिन क्या राम का कोई धर्म (उत्तरदायित्व) नहीं था सीता के प्रति? ये सवाल हमें बहुत परेशान करता है? धर्म क्या हमेशा बेटियों के लिए ही होता है?
बेटियों का धर्म तो है, पर उनकी तरफ किसी का, कोई धर्म नहीं? क्यों है ऐसा? ये टीस हमारे मन से निकलती ही नहीं।
राजा जनक ने सीता के लिए वर चुनने की खातिर बहुत कठिन परीक्षा रखी थी, ताकि पूरे आर्यवर्त का सबसे योग्य वर ही सीता को मिले। राम ने उस परीक्षा में अपनी योग्यता साबित कर सीता से विवाह तो कर लिया... लेकिन जिस वजह से जनक ने धनुष की डोर चढ़ाने की वो शर्त रखी थी, उसकी कसौटी पर राम खरे नहीं उतरे। सीता की सुरक्षा, उनकी सुख सुविधा का ध्यान रखने में वो सर्वथा अयोग्य साबित हुए।
इसीलिए मिथिला, अपने पाहुन, कुटुम्ब, दामाद श्री राम से नाखुश रहा किया है। श्री राम ने हमारी सुकुमारी बेटी का ख्याल नहीं रखा।
हम इससे इतने आहत हैं कि हमने सिया को अभागन मान-समझ लिया और अब अपनी किसी बेटी का नाम सीता नहीं रखते। वो इसलिए कि हमें डर लगता है कि सिया नाम रखने से कहीं उसको राम सा पति मिल गया तो?
नहीं, हमारी बेटियों का भाग्य ऐसा नहीं होना चाहिए। वो इतनी बदकिस्मत नहीं हो सकतीं, उन्हें श्री राम सा पति नहीं मिलना चाहिए।
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जब सिया सुकुमारी को दुष्ट रावण हर ले गया तो अवध के राजकुमार ने नहीं, उन्हें किष्किंधा के महावीर हनुमान ने खोजा था...लंका से लेकर उन्हें वही आए।
हनुमान...
बजरंगबली...
पवनसुत...
केसरीनंदन ही वो महावीर थे, जिन्होंने जानकी को सबसे ज्यादा आदर और सम्मान दिया। उनके लिए सदैव तत्पर रहे। सीता की बात हो, तो उन्होंने कोई कायदा नहीं माना, किसी मर्यादा में बंधे नहीं रहे।
तो रामनवमी के दिन... हमारे गांव में बजरंगबली की पूजा होती रही है। पहले हर आंगन के ठीक बीच में एक उंचा ध्वजा गड़ा होता था। सालोंभर फहरानेवाला ये पताका, रामनवमी के दिन ही बदला जाता था। ये हनुमान पताका होता था।
नए बांस में नया हनुमान पताका....
इसे ध्वजा फेरना पुकारते थे। स्थानीय बोली में धाजा फेराय। पहले हनुमान जी की पूजा फिर ध्वजा फेराई... के बाद चीनी के लड्डू प्रसाद में मिलते थे। मिट्टी के छोटे गोल बर्तन, जिसे कंहतरी कहते थे में भरकर चीनी के लड्डू बच्चों और बड़ों में बांटे जाते थे।
अहा क्या स्वाद होता था उनका!
इलाके के हर गांव के ज्यादतर आंगन में, आपको हनुमान ध्वजा फहराता दिख जाता।
बजरंगबली की जय!
शायद इसलिए ही हमारे यहां कुश्ती का जबरदस्त चलन था, मनोरंजन का इकलौता साधन थी कुश्ती और पहलवानी... हनुमान भी तो पहलवान ही थे।
(साभार: अजय कुमार सिंह)
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