इतिहास में स्त्री

इतिहास में स्त्री- तेरह
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साहित्य में बिखरे हुए वेश्यावृत्ति के संदर्भ ये बताते हैं कि प्राचीन भारत के पूरे ऐतिहासिक काल में एक पेशे के रूप में वेश्यावृत्ति की पहचान थी। ऋग्वैदिक काल के  क्षीण संदर्भो को छोड़ दें तो उत्तर वैदिक काल से इस पेशे के निरंतरता से बने रहने में कोई संदेह नहीं है।समाज से मिलने वाले लगाव और दुराव के बीच वेश्याएँ अपनी अनिवार्य उपस्थिति दर्ज़ कराती हुई समाज का अभिन्न अंग प्रतीत होती हैं।हम उन्हें राजकीय एवं सार्वजनिक उत्सवों, जलसों, पर्व-त्यौहारों और उर्वरता से सम्बंधित कर्म काण्डों में उपस्थित पाते हैं। वेश्यावृत्ति के पेशे में यौन संबंधों की आवृत्ति की वजह से वेश्याओं को उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। इसी प्रतीकात्मकता ने उर्वरता संबंधी कर्मकांडों में वेश्या की उपस्थिति अनिवार्य बना दी।वेश्याओं की राजकीय उत्सव,लक्ष्मी पर्व,शिव पर्व में उपस्थिति उन्हें समाज का अपरिहार्य अंग बनाती है।
चूंकि वेश्यावृत्ति के पेशा शारीरिक आकर्षण पर आधारित था,यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उम्र बढ़ने के साथ वेश्या-वर्ग की स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति  बदल जाती होगी।कुट्टनी- माता   में पेशे से छांट दी गई ऐसी वेश्याओं जे उल्लेख हैं जिन्हें बदली हुई परिस्थिति में कई बार भुखमरी की स्थिति से गुजरना पड़ता था और पेट पालने के लिए चोरी- चकारी,छल-कपट , भीख आदि का सहारा लेना पड़ता था। यही वेश्यावृत्ति के पेशे के कटु यथार्थ था।
______________नीलिमा
#her_story

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